रायपुर:
छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाले गरीब मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना वर्तमान में एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। विधानसभा पटल पर प्रस्तुत किए गए नवीनतम और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य का स्वास्थ्य विभाग डॉक्टरों और मुख्य पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहा है। सबसे चौंकाने वाली स्थिति ‘चिकित्सा विशेषज्ञों’ (Specialist Doctors) की है, जहां प्रदेश भर में स्वीकृत कुल २,०२५ पदों में से रिकॉर्ड १,६२६ पद खाली पड़े हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकारी अस्पतालों में केवल ४०८ विशेषज्ञ डॉक्टर ही कार्यरत हैं, जिससे गंभीर बीमारियों के इलाज, सिजेरियन प्रसव और बड़े ऑपरेशनों के लिए मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
दस्तावेजों के मुताबिक, न केवल विशेषज्ञ बल्कि अस्पतालों की रीढ़ मानी जाने वाली ‘स्टाफ नर्सों’ (स्टॉफ परिचारिका) के पदों पर भी भारी रिक्तियां हैं। पूरे प्रदेश में स्टाफ नर्सों के स्वीकृत 6827 पदों में से 2745 पद खाली पड़े हैं और केवल 4082 नर्सें ही कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले ‘ग्रामीण चिकित्सा सहायकों’ (आरएमए) के 817 स्वीकृत पदों में से 193 पद खाली हैं। दंत चिकित्सकों के मामले में भी 180 स्वीकृत पदों में से 74 पद खाली पड़े हैं। हालांकि, राहत की बात केवल साधारण ‘चिकित्सा अधिकारियों’ (Medical Officers) के स्तर पर है, जहां 2699 स्वीकृत पदों में से 2391 पदों पर डॉक्टर कार्यरत हैं और केवल 308 पद ही खाली हैं।
जशपुर और सरगुजा संभाग में सबसे बुरा संकट
पहाड़ी और वनांचल अंचलों में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से बेपटरी हो चुकी हैं। जशपुर जिले की बात करें तो यहाँ चिकित्सा विशेषज्ञों के 193 स्वीकृत पदों में से 94 पद खाली हैं और केवल 19 विशेषज्ञ कार्यरत हैं। यही नहीं, जिले में 351 स्टाफ नर्सों के पदों में से 114 पद खाली पड़े हैं। सरगुजा जिले में भी चिकित्सा विशेषज्ञों के108 स्वीकृत पदों में से 80 पद खाली हैं और केवल 28 कार्यरत हैं। कबीरधाम (कवर्धा) जिले में विशेषज्ञों के 84 स्वीकृत पदों में से केवल 4 डॉक्टर ही कार्यरत हैं, जबकि 80 पद रिक्त पड़े हैं। इसी तरह बस्तर संभाग के जगदलपुर और सुकमा जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में भी विशेषज्ञों और नर्सों के खाली पदों की संख्या सैकड़ों में है।
चिकित्सकीय अमले की इस भारी कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में अक्सर केवल चिकित्सा अधिकारी ही पूरा प्रभार संभाल रहे हैं, जबकि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को तत्काल बड़े शहरों के अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सुदूर वनांचल क्षेत्रों में डॉक्टरों की पोस्टिंग न होना और संविदा भर्तियों में योग्य विशेषज्ञों का न मिलना इस संकट को और गहरा कर रहा है। जब तक सरकार इन 9300 से अधिक रिक्त पदों को भरने के लिए कोई ठोस और त्वरित नीति नहीं बनाती, तब तक स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार का दावा केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।


