बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 15 साल से अधिक पुराने वेतन निर्धारण (Pay Fixation) की गलती का हवाला देकर एक सेवानिवृत्त सहायक शिक्षिका से 3,72,824 रुपये की वसूली करने के विभागीय आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि जब विभाग की अपनी लिपिकीय चूक के कारण अतिरिक्त भुगतान हुआ हो और कर्मचारी की ओर से कोई धोखाधड़ी नहीं की गई हो, तो रिटायरमेंट के बाद ऐसी वसूली पूरी तरह गैर-कानूनी है।
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने यह फैसला गोड़पारा (बिलासपुर) निवासी 63 वर्षीय सेवानिवृत्त सहायक शिक्षिका सुधा वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
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विभाग की गलती का खामियाजा कर्मचारी क्यों भुगते: कोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने तर्क दिया था कि वेतन निर्धारण के समय क्लेरिकल गलती के कारण याचिकाकर्ता का वेतन अधिक तय हो गया था। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि:याचिकाकर्ता एक तृतीय श्रेणी (Class-III) कर्मचारी थीं।रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्होंने अधिक वेतन पाने के लिए कोई गलत जानकारी दी या धोखाधड़ी की।विभाग की अपनी गलती के चलते हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के नजीर फैसले का बना आधार
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के बहुचर्चित ‘स्टेट ऑफ पंजाब विरुद्ध रफीक मसीह’ मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के अनुसार, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों अथवा सेवानिवृत्त कर्मियों से वर्षों बाद किसी विभागीय गलती के आधार पर अतिरिक्त भुगतान की वसूली नहीं की जा सकती।
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काटी गई राशि लौटाने के निर्देश
सुधा वर्मा ने बिल्हा के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) द्वारा 17 जून 2025 को जारी वसूली आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने इस रिकवरी आदेश को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि:यदि याचिकाकर्ता से कोई राशि रोकी या वसूली गई है, तो विभाग उसे तत्काल वापस करे।यदि विभाग वेतन निर्धारण की नए सिरे से जांच करना चाहता है, तो उसे याचिकाकर्ता को सुनवाई का पर्याप्त अवसर (Natural Justice) देना अनिवार्य होगा।























