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रायपुर:
छत्तीसगढ़ में सड़कों पर रफ्तार का कहर और हादसों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे राज्य की सड़कें खून से लाल हो रही हैं। जनवरी 2023 से लेकर 15 जून 2026 तक की स्थिति में विधानसभा पटल पर रखे गए आधिकारिक आंकड़ों ने प्रदेश में सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों के पालन को लेकर एक बेहद खौफनाक तस्वीर पेश की है। इन साढ़े तीन वर्षों की अवधि में राज्य भर में कुल 51,883 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 23,820 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। इसके साथ ही इन हादसों में 43,950 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिनमें से कई जीवन भर के लिए दिव्यांग हो चुके हैं। ये आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि राज्य में हर रोज औसतन दर्जनों लोग सड़क हादसों का शिकार होकर असमय मौत के मुंह में समा रहे हैं।
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सरकारी रिपोर्ट के जिलेवार विश्लेषण से यह साफ उजागर होता है कि प्रदेश की राजधानी रायपुर सड़क हादसों और मौतों के मामले में पूरे राज्य में सबसे आगे और सबसे खतरनाक साबित हुई है। रायपुर जिले में साल 2023 में 1,961 हादसे हुए जिनमें 507 लोगों की मौत हुई, जबकि साल 2024 में यह ग्राफ बढ़कर 2,079 हादसों और 594 मौतों तक पहुंच गया। साल 2025 में भी रायपुर में 2,086 दुर्घटनाएं दर्ज की गईं और रिकॉर्ड 621 लोगों ने अपनी जान गंवाई। साल 2026 में भी 15 जून तक राजधानी में 1,092 हादसे और 351 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। इन साढ़े तीन सालों के कुल योग को देखें तो अकेले रायपुर जिले में 7,218 भीषण हादसों में 2,073 लोगों की मौत हो चुकी है और 5,084 लोग घायल हुए हैं।
न्यायधानी बिलासपुर और औद्योगिक हब दुर्ग जिले में भी सड़कों पर मौत का तांडव लगातार जारी है। बिलासपुर जिले में इन साढ़े तीन वर्षों में कुल 4,815 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,189 लोगों की दर्दनाक मौत हुई और 4,360 लोग घायल हुए। वहीं दुर्ग जिले की स्थिति भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है, जहां इस अवधि के दौरान कुल 4,417 हादसे दर्ज किए गए, जिनमें 1,156 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और 3,749 लोग घायल हुए। मैदानी इलाकों के अन्य बड़े जिलों जैसे रायगढ़ में 1,358 मौतें, कोरबा में 1,327 मौतें, सरगुजा में 1,184 मौतें, महासमुंद में 1,072 मौतें, जशपुर में 1,092 मौतें और बलौदाबाजार में 1,031 मौतें दर्ज की गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि राज्य का कोई भी बड़ा जिला इस जानलेवा रफ्तार से अछूता नहीं है।
इस भयावह आंकड़ों के बीच अगर राज्य के सुदूर और छोटे जिलों की बात करें, तो वहां बड़े शहरों की तुलना में हादसों और मौतों की संख्या काफी कम है, लेकिन वहां की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से ये आंकड़े भी कम गंभीर नहीं हैं। नारायणपुर जिला पूरे प्रदेश में सबसे कम हादसों वाला क्षेत्र रहा है, जहां साढ़े तीन साल में केवल 200 दुर्घटनाएं हुईं और 114 लोगों की जान गई। इसी तरह सुकमा जिले में 204 मौतें, बीजापुर में 233 मौतें और दंतेवाड़ा में 273 लोगों की मौत इन वर्षों में सड़क हादसों के कारण हुई है। गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में 308 और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में 304 लोगों ने अपनी जान गंवाई है।
सड़कों पर बहते खून और उजड़ते परिवारों के इस भयावह सिलसिले को रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। यातायात पुलिस और जिला प्रशासन द्वारा लगातार ब्लैक स्पॉट्स यानी दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें दुरुस्त करने का काम किया जा रहा है, ताकि सड़कों की तकनीकी कमियों की वजह से होने वाले हादसों को न्यूनतम किया जा सके। इसके साथ ही, प्रदेश भर में ‘इंटरसेप्टर वाहनों’ के जरिए तेज रफ्तार गाड़ियों और शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ चौबीसों घंटे धरपकड़ और दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है, जिससे नियमों का उल्लंघन करने वालों में कानून का डर पैदा हो सके।
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प्रशासनिक सख्ती के अलावा, जमीनी स्तर पर लोगों की मानसिकता बदलने के लिए बड़े पैमाने पर जन-जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्कूली बच्चों से लेकर व्यावसायिक वाहन चालकों तक को हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने और यातायात संकेतों का पालन करने के लिए नुक्कड़ नाटकों, सोशल मीडिया कैंपेन और कार्यशालाओं के माध्यम से जागरूक किया जा रहा है। विशेष रूप से युवाओं को रफ ड्राइविंग के खतरों के प्रति सचेत करने के लिए कॉलेज स्तर पर विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं। पुलिस विभाग का मानना है कि हादसों के ये आंकड़े और भी भयावह हो सकते थे, लेकिन लगातार किए जा रहे इन जागरूकता प्रयासों और समय पर घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए तैयार किए गए ‘ग्रीन कॉरिडोर’ व क्विक रिस्पॉन्स टीमों की वजह से हजारों लोगों की जान बचाई भी जा सकी है। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि जब तक आम जनता में खुद की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी का भाव नहीं जागेगा, तब तक सरकारी प्रयासों के शत-प्रतिशत परिणाम मिलना मुमकिन नहीं है।
शासन, प्रशासन और आम जनता के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। साल दर साल बढ़ते हादसों के मामले यह साफ करते हैं कि केवल कागजों पर यातायात सप्ताह मनाने या महज चालानी कार्रवाई करने से सड़कों पर मौतों का यह तांडव रुकने वाला नहीं है। ब्लैक स्पॉट्स को दुरुस्त न किया जाना, तेज रफ्तार पर लगाम न होना, शराब पीकर वाहन चलाना और हेलमेट व सीट बेल्ट के प्रति लापरवाही ही इन हजारों परिवारों के उजड़ने की मुख्य वजह बन रही है। इस गंभीर राष्ट्रीय क्षति को रोकने के लिए अब सरकार को कड़े नीतिगत फैसले लेने और जमीन पर सख्त यातायात प्रबंधन लागू करने की तत्काल आवश्यकता है।
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