जशपुर (छत्तीसगढ़): मानसून की शुरुआत के साथ ही जशपुर जिले के फरसाबहार और कांसाबेल अंचल में ईब और उसकी सहायक सोनाजोरी नदी के कछारों पर एक अजीब सी चहल-पहल शुरू हो जाती है। कमर तक पानी में डूबे महिला, पुरुष और बच्चे दिनभर रेत और गिट्टी छानते हैं। तलाश है—नदी में बहने वाले उस सोने की, जो सदियों से बह रहा है, लेकिन आज तक न तो भू-वैज्ञानिक इसके मूल स्रोत का पता लगा सके हैं और न ही इसे निकालने वाले ‘स्वर्ण पुत्रों’ की किस्मत बदल सकी है।
रियासत के लड़ाके बने ‘स्वर्ण पुत्र’
स्थानीय झोरा जाति के लोगों को यहां ‘स्वर्ण पुत्र’ कहा जाता है। रियासतकाल में यह समुदाय राजघराने की सेनाओं का मुख्य हिस्सा था। रियासतों के विलय के बाद जब आजीविका का संकट आया, तो इस समुदाय ने ईब नदी के किनारे बस्तियां बसाईं और सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान से पानी से सोना निकालने का काम शुरू किया।
आज फरसाबहार के भगोरा, बोखी, मेंडरबहार, वनगांव, तुबा और कांसाबेल के दोकड़ा, शबदमुंडा, जोगबहला सहित करीब एक दर्जन गांवों की आजीविका बारिश के इन तीन-चार महीनों पर टिकी होती है।
‘दोबायन’ और ‘निझायर’: आदिम इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना
सोने के महीन कण निकालने के लिए किसी रासायनिक या आधुनिक मशीन का इस्तेमाल नहीं होता। झोरा समुदाय लकड़ी के बने पारंपरिक औजारों का प्रयोग करता है:
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दोबायन: यह महुआ या अन्य मजबूत लकड़ी से बना आयताकार पात्र होता है, जिसके बीच में कटोरीनुमा गड्ढा और बारीक छिद्र होता है। गुरुत्वाकर्षण और घनत्व के आधार पर भारी स्वर्ण कण इसमें फंस जाते हैं और रेत पानी के साथ बह जाती है।
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निझायर: इस छोटे पात्र से बचे हुए गाद को अंतिम रूप से धोया जाता है, जिसके बाद हथेली पर चमकते हुए स्वर्ण कण साफ दिखाई देने लगते हैं।
3 दिन की हाड़तोड़ मेहनत, कीमत सिर्फ ₹400-500: दलालों के चंगुल में ग्रामीण
पमशाला की शांति बाई बताती हैं कि कमरतोड़ ठंड और पानी में तीन दिन लगातार मेहनत करने के बाद बमुश्किल एक ‘धान के दाने’ के बराबर सोना जमा हो पाता है।
लेकिन असली मुनाफा बिचौलिए और तस्कर कमाते हैं। स्थानीय दलाल इस सोने को ग्रामीणों से महज 400 से 500 रुपये में खरीद लेते हैं, जबकि सराफा बाजार में इसकी वास्तविक कीमत 1,000 से 1,200 रुपये से भी अधिक होती है। यह सोना सीमावर्ती राज्यों ओडिशा और झारखंड के बड़े कारोबारियों के नेटवर्क तक अवैध तरीके से पहुंचाया जाता है।
2010 का सर्वे और विरोध: क्यों दफन रह गया खजाना?
नदी में सोना कहां से आ रहा है, इसका पता लगाने के लिए वर्ष 2010 में केंद्र और राज्य सरकार ने जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (JSPL) और मुंबई की ‘मार्क’ कंपनी को खनिज खोज (रिकगनिशन परमिट) का लाइसेंस दिया था।
करीब छह महीने तक चले प्राथमिक सर्वे में यह पुष्टि हुई कि इलाके में प्रचुर स्वर्ण भंडार मौजूद है। हालांकि, भारी मशीनीकृत खनन से जल, जंगल और जमीन के उजड़ने की आशंका के चलते स्थानीय ग्रामीणों ने उग्र विरोध शुरू कर दिया। नतीजतन, सर्वे बीच में ही बंद करना पड़ा और आज तक यह रहस्य बना हुआ है कि ईब नदी में बहकर आने वाले सोने का मुख्य स्रोत (Mother Lode) कौन सा पहाड़ है।
किवदंतियां: मारीच का स्वर्ण मृग रूप या नागलोक के बर्तन?
वैज्ञानिक तर्कों से परे स्थानीय लोकसंस्कृति में इसके पीछे कई दंतकथाएं प्रचलित हैं:
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स्वर्ण मृग की गाथा: मान्यता है कि रामायण काल में जब मारीच स्वर्ण मृग बनकर ईब नदी से होकर गुजरा था, तब उसके शरीर के संपर्क से नदी में स्वर्ण कण घुल गए।
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कोतेबीरा धाम और नागलोक: तपकरा के पास स्थित कोतेबीरा धाम को नागलोक का द्वार माना जाता है। किवदंती है कि देवगण सोने के बर्तनों से यात्रियों की सेवा करते थे। इंसानी लालच से नाराज होकर वे नाग रूप धारण कर पाताल लोक चले गए और अपने सोने के बर्तन नदी में छोड़ गए, जो आज कण-कण बनकर बहते हैं।
सवाल जो अब भी कायम है: क्या सरकार स्थानीय झोरा समुदाय को बिचौलियों के शोषण से बचाने के लिए कोई वैध सहकारी तंत्र या खरीद केंद्र स्थापित करेगी, या फिर ‘स्वर्ण पुत्र’ यूं ही बहुमूल्य धातु छानते हुए मुफलिसी में जीने को मजबूर रहेंगे?


