रायपुर:
छत्तीसगढ़ में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान (SSR/SIR) की शुरुआत के साथ ही एक बार फिर स्कूली शिक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। आयोग द्वारा चलाए जा रहे इस राष्ट्रव्यापी अभियान में प्रदेशभर के सैकड़ों स्कूली शिक्षकों को बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) नियुक्त कर मैदानी जिम्मेदारी सौंपी गई है। ठीक 1 दिसंबर से स्कूलों में छमाही (अर्धवार्षिक) परीक्षाएं प्रस्तावित हैं, ऐसे में ऐन परीक्षा से पहले शिक्षकों की गैर-शैक्षणिक ड्यूटी लगने से प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम पूरा कराने और विद्यार्थियों की तैयारी को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
छमाही परीक्षा सिर पर, कैसे पूरा होगा सिलेबस?
शिक्षा सत्र के मध्य में परीक्षाओं से ठीक पहले शिक्षकों के स्कूल से बाहर रहने को लेकर अभिभावकों और शिक्षक संगठनों में गहरी चिंता है:
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1 दिसंबर से परीक्षाएं: प्रदेशभर के शासकीय विद्यालयों में अर्धवार्षिक परीक्षाएं 1 दिसंबर से शुरू होनी हैं। अक्टूबर और नवंबर का समय छूटे हुए पाठ्यक्रम को पूरा कराने और रिवीजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
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शिक्षकों की दोहरी चुनौती: दिनभर डोर-टू-डोर सर्वे, फॉर्म-6, 7 और 8 का संकलन, ऑनलाइन डेटा एंट्री और आपत्तियों के निस्तारण में उलझने के बाद शिक्षकों के लिए कक्षाओं में नियमित अध्यापन कराना लगभग असंभव हो रहा है।
एकल-शिक्षकीय स्कूलों में तालाबंदी जैसे हालात
राज्य के कई ग्रामीण और दूरस्थ अंचलों में पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है, जहां इस आदेश का सीधा दुष्प्रभाव दिखने लगा है:
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एक शिक्षक के भरोसे पूरी शाला: प्रदेश के दर्जनों प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक या दो शिक्षक ही कक्षा 1 से 5वीं या 8वीं तक के बच्चों को संभालते हैं।
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कक्षाएं खाली रहने का जोखिम: यदि एकल-शिक्षकीय स्कूल का शिक्षक बीएलओ कार्य के तहत घर-घर मतदाता सर्वे या प्रशिक्षण में चला जाता है, तो उस दिन स्कूल का संचालन पूरी तरह ठप होने अथवा बच्चों के भगवान भरोसे छूट जाने की नौबत आ जाती है।
11 दिसंबर तक चलेगा अभियान, महीने भर रहेगा दबाव
निर्वाचन आयोग की समय-सारिणी के अनुसार मतदाता सूची में नाम जोड़ने, विलोपित करने और संशोधन के लिए दावे-आपत्तियां दर्ज कराने का काम 11 दिसंबर तक चलेगा:
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पूरा नवंबर रहेगा व्यस्त: शिक्षकों को पूरे एक महीने तक मतदाता केंद्रों और मतदाताओं के घरों के चक्कर काटने होंगे।
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गैर-शैक्षणिक कार्यों पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल: शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम और अदालतों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद शिक्षकों को बार-बार गैर-शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों में झोंके जाने की परिपाटी से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लग रहा है।
प्रशासनिक मजबूरी बनाम बच्चों का भविष्य
एक तरफ लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण और अद्यतन होना अपरिहार्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, तो दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और ग्रामीण बच्चों का भविष्य दांव पर है। शिक्षक संघों और शिक्षाविदों का कहना है कि प्रशासन को शिक्षकों के स्थान पर अन्य विभागों के संविदा कर्मचारियों, पंचायत सचिवों, रोजगार सहायकों या पटवारियों (हड़ताल समाप्त होने उपरांत) के जरिए यह व्यवस्था बनानी चाहिए, ताकि परीक्षा की दहलीज पर खड़े विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित न हो।


