आज 14 सितंबर का दिन भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना के लिहाज से ऐतिहासिक बन गया है। देश भर में आज एक दुर्लभ संयोग के तहत हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी और राष्ट्रीय हिंदी दिवस का पर्व एक साथ बड़े ही उत्साह और गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। एक ओर जहां धार्मिक श्रद्धा के तहत आज दिनभर घरों और पंडालों में उमा-महेश्वर और विघ्नहर्ता गजानन की आराधना होगी, वहीं दूसरी ओर शिक्षण संस्थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों में संघ की राजभाषा हिंदी के सम्मान में विभिन्न कार्यक्रमों की धूम देखने को मिल रही है।

दुर्लभ धार्मिक महासंयोग: ‘गणपति तीज’ पर आज विराजेंगे शिव-पार्वती और बप्पा
पंचांग गणना के अनुसार वर्षों बाद ऐसा दुर्लभ संयोग बना है जब तृतीया और चतुर्थी तिथि का अद्भुत मिलन हो रहा है। इसे विद्वानों ने ‘व्रतों की त्रिवेणी’ और ‘गणपति तीज’ का नाम दिया है:
अखंड सौभाग्य का निर्जला व्रत: आज सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए 24 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की बालू व मिट्टी की प्रतिमाओं की विधिवत पूजा-अर्चना कर रही हैं। 
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विघ्नहर्ता का भव्य आगमन: आज दोपहर मध्याह्न काल में शुभ मुहूर्त के बीच घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में मंगलमूर्ति श्रीगणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारों के साथ 10 दिवसीय गणेशोत्सव का औपचारिक शुभारंभ हो रहा है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी पर होगा।

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शुभ योगों का संगम: रवियोग, बुधादित्य योग और चित्रा-स्वाति नक्षत्र के मेल ने आज के दिन के आध्यात्मिक महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है।
14 सितंबर 1949 की ऐतिहासिक स्मृति: राष्ट्रीय हिंदी दिवस पर भाषा का सम्मान
धार्मिक आयोजनों के उल्लास के बीच आज का दिन देश की भाषाई अस्मिता को भी समर्पित है:
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संवैधानिक पृष्ठभूमि: 14 सितंबर 1949 को ही संविधान सभा ने लंबी चर्चा के बाद देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा (अनुच्छेद 343) के रूप में स्वीकार किया था।

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1953 से अनवरत परंपरा: राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल पर 1953 से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। आज स्कूलों, विश्वविद्यालयों, मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में ‘हिंदी पखवाड़ा’ व विचार-गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है।
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साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां: आज विभिन्न संस्थानों में भाषण, निबंध लेखन, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं और काव्य सम्मेलनों का आयोजन कर राजकाज और जनजीवन में हिंदी के अधिक से अधिक प्रयोग का संकल्प लिया जा रहा है।
आध्यात्म और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अनूठा समन्वय
आज का दिन भारतीय जनमानस के बहुआयामी स्वरूप को जीवंत कर रहा है। जहां सुबह से महिलाएं निर्जला व्रत के संकल्प के साथ शिव-शक्ति की साधना में लीन हैं, वहीं दोपहर तक गाजे-बाजे के साथ प्रथम पूज्य गजानन की अगवानी की जाएगी। इसी के समानांतर बौद्धिक और प्रशासनिक मंचों पर देश की संपर्क भाषा हिंदी के प्रसार, सम्मान और गौरव पर मंथन होगा। आस्था, संस्कार और मातृभाषा का यह त्रिवेणी संगम आज पूरे देश को एक सूत्र में पिरो रहा है।
























