विघ्नहर्ता, बुद्धि-विवेक के प्रदाता और रिद्धि-सिद्धि के स्वामी भगवान श्रीगणेश के जन्मोत्सव का महापर्व ‘गणेश चतुर्थी’ आज 14 सितंबर को देशभर में आस्था, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू सनातन परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है, जिनके स्मरण और वंदन के बिना किसी भी मांगलिक या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत नहीं होती। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मध्याह्न व्यापनी मुहूर्त में आज घर-घर और सार्वजनिक भव्य पंडालों में मंगलमूर्ति की प्रतिमाएं वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्थापित की जा रही हैं। इसी के साथ 11 दिवसीय ऐतिहासिक व सांस्कृतिक गणेश महोत्सव का शुभारंभ हो गया है, जिसकी पूर्णता 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ होगी।

मूर्ति स्थापना का पंचांग विवरण और शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी भगवान गणपति की प्राकट्य तिथि है। शास्त्रों के अनुसार मध्याह्न काल यानी दोपहर के समय गणेश जी का जन्म हुआ था, इसलिए स्थापना पूजन इसी अवधि में करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है:
| अनुष्ठान / तिथि विवरण | निर्धारित समय एवं तारीख |
| चतुर्थी तिथि का प्रारंभ | 14 सितंबर 2026, सोमवार प्रातः 07:06 बजे |
| चतुर्थी तिथि का समापन | 15 सितंबर 2026, मंगलवार प्रातः 07:44 बजे |
| मूर्ति स्थापना एवं पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त | सुबह 10:50 बजे से दोपहर 01:18 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 28 मिनट) |
| गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी) | 25 सितंबर 2026, शुक्रवार |
शिवपुराण की प्राकट्य गाथा: द्वारपाल बालक से गजानन बनने की यात्रा
शिवपुराण के रुद्रसंहिता खंड के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान की तैयारी कर रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के मैल और उबटन से एक अत्यंत रूपवान और तेजस्वी बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी। माता ने उस बालक को अपना पुत्र मानते हुए द्वार पर पहरा देने और किसी को भी भीतर प्रवेश न करने देने का सख्त आदेश दिया।
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शिव-पुत्र संघर्ष: इसी दौरान देवाधिदेव भगवान शिव वहां पहुंचे। बालक गणेश माता की आज्ञा का पालन करते हुए द्वार पर अडिग खड़े रहे और महादेव को भीतर जाने से रोक दिया। भगवान शिव और उनके गणों ने बालक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन कर्तव्यनिष्ठ बालक अपनी माता के आदेश से पीछे नहीं हटा। गणों की पराजय के बाद क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
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पार्वती का रौद्र रूप और हाहाकार: जब माता पार्वती स्नान कर बाहर आईं और अपने पुत्र को निष्प्राण देखा, तो वे अत्यंत शोकाकुल और कुपित हो उठीं। उन्होंने रौद्र रूप धारण कर संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की घोषणा कर दी। माता के इस भयंकर क्रोध से तीनों लोकों और देवगणों में त्राहि-त्राहि मच गई।
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गजमुख की स्थापना: माता पार्वती को शांत करने के लिए भगवान शिव ने भगवान विष्णु को निर्देश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और किसी ऐसे जीव का सिर लाएं जिसकी माता अपने बच्चे की ओर पीठ करके सो रही हो। गरुड़ जी की खोज में एक हथिनी ऐसी मिली जो अपने शिशु की ओर पीठ कर सो रही थी। गरुड़ जी उस नवजात हाथी का मस्तक लेकर उपस्थित हुए। भगवान शिव ने उस गज मस्तक को बालक के धड़ से जोड़कर उसे पुनर्जीवित कर दिया।
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अग्रपूज्य का वरदान: गज का मुख धारण करने के कारण बालक का नाम ‘गजानन’ पड़ा। महादेव ने उन्हें अपने सभी गणों का स्वामी घोषित करते हुए ‘गणपति’ नाम दिया और वरदान दिया कि संसार के समस्त देवताओं में सबसे पहले तुम्हारी पूजा होगी। किसी भी यज्ञ, अनुष्ठान या नए कार्य की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी का आवाहन करने का नियम तभी से स्थापित हुआ।
चंद्रमा के अभिमान का भंजन और कलंक चतुर्थी का श्राप
गणेश चतुर्थी के दिन रात्रि में चंद्र दर्शन को शास्त्रों में वर्जित (निषेध) माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान गणेश गजानन स्वरूप में देवताओं द्वारा पूजे जा रहे थे, तब सौंदर्य के देवता माने जाने वाले चंद्रमा को अपने रूप और कांति पर बड़ा अभिमान था। उन्होंने गणेश जी के विशाल उदर और गजमुख स्वरूप को देखकर उपहासपूर्ण हंसी हंसी।
चंद्रमा के इस मिथ्या अभिमान को देखकर गणेश जी कुपित हो गए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि उनका सारा रूप और तेज नष्ट हो जाएगा तथा वे पूर्णतः काले हो जाएंगे। चंद्रमा को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने क्षमा याचना की। तब दयालु विघ्नहर्ता ने कहा कि सूर्य के प्रकाश के प्रभाव से वे पुनः क्रमशः प्रकाशित होंगे, लेकिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का दिन उनके अहंकार के दंड का हमेशा स्मरण कराएगा। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन करता है, उस पर झूठे कलंक या चोरी का अपयश लगने का भय रहता है।
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भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का विशिष्ट महत्व: साल में 13 चतुर्थियों का व्रत
हिंदू पंचांग में हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी का व्रत किया जाता है। सामान्यतः लोग वर्ष भर में 12 चतुर्थियों का व्रत करते हैं, लेकिन भाद्रपद मास की दोनों चतुर्थियों का विशेष महात्म्य होने के कारण इसे कुल 13 व्रतों की गणना में गिना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की यह चतुर्थी इसलिए सबसे विशिष्ट है क्योंकि यही विघ्नहर्ता का प्राकट्य दिवस है। शेष सभी चतुर्थियों में चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है, जबकि केवल इसी चतुर्थी को चंद्र दर्शन वर्जित माना गया है।
गणेश जी को ‘लंबोदर’ क्यों कहा जाता है?
ज्योतिष और वैदिक दर्शन के अनुसार सृष्टि में तीन गण माने गए हैं—देव, मनुष्य और राक्षस। भगवान गणेश ब्रह्मस्वरूप हैं और वे तीनों लोकों तथा तीनों गणों में समान रूप से प्रतिष्ठित हैं:
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विशाल उदर का गूढ़ अर्थ: उनके उदर (पेट) में संपूर्ण ब्रह्मांड और तीनों लोक समाहित हैं। वे संसार की हर बात, सुख-दुख, मान-अपमान और गुप्त रहस्यों को पचाने की अनंत क्षमता रखते हैं।
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रहस्यमय स्वरूप: लंबोदर होने का दार्शनिक संदेश यह भी है कि बुद्धिमान मनुष्य को हर बात सुनकर अपने भीतर समाहित कर लेनी चाहिए, व्यर्थ में प्रकट नहीं करनी चाहिए। गणेश जी के इस दिव्य रहस्य को कोई भेद नहीं सकता।

दूर्वा, मोदक और जन-जन की आस्था: गणेशोत्सव का सामाजिक संदेश
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अकिंचन के भी आराध्य: जहां बड़े देवताओं को प्रसन्न करने के लिए दुर्लभ सामग्रियां जुटानी पड़ती हैं, वहीं रिद्धि-सिद्धि के स्वामी भगवान गणेश सहजता से मिलने वाली घास यानी ‘दूर्वा’ (दूब) और साधारण ‘मोदक’ से ही तृप्त हो जाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वे राजा और रंक दोनों के प्रति समान भाव रखते हैं।
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सांस्कृतिक एकता का महापर्व: श्रावण मास की पूर्णता और प्रकृति के नवश्रृंगार के बाद जब भाद्रपद में मिट्टी से गणपति की प्रतिमाएं ढाली जाती हैं, तो यह सीधे प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ने का पर्व बन जाता है। बाल गंगाधर तिलक द्वारा इसे स्वतंत्रता संग्राम में सामाजिक एकता का माध्यम बनाया गया था, जो आज देश के हर कोने में जाति, वर्ग और संप्रदाय की सीमाओं को मिटाकर सांस्कृतिक समरसता का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।
























