प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश के जन्मोत्सव का महापर्व ‘गणेशोत्सव’ पूरे भारत में सांस्कृतिक विविधता और असीम श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। अलग-अलग राज्यों में इस पर्व की समयावधि, पूजा पद्धति और परंपराएं भले ही भिन्न हों, लेकिन विघ्नहर्ता के स्वागत का उत्साह हर जगह एक समान नजर आता है। देश के अधिकांश राज्यों में जहां यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी पर संपन्न होता है, वहीं कई राज्यों में यह 1, 3, 5 या 7 दिनों तक मनाया जाता है। भव्य और कलात्मक झांकियों का निर्माण इस राष्ट्रीय पर्व की सबसे बड़ी साझा पहचान है।
महाराष्ट्र और गोवा की पारंपरिक धूम
महाराष्ट्र गणेशोत्सव का वैश्विक केंद्र माना जाता है, जहां 3, 5 और 10 दिनों तक यह पर्व चलता है। मुंबई और पुणे के लालबागचा राजा व श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई जैसे विश्व प्रसिद्ध पंडाल, आगमन सोहला, ढोल-ताशा पथक, नौवारी साड़ी और गिरगांव चौपाटी पर होने वाला महाविसर्जन यहां की मुख्य पहचान हैं। वहीं गोवा में इसे ‘चवथ’ कहा जाता है, जहां 2 से 7 दिनों तक घर-परिवार के स्तर पर मिट्टी की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और पूजा स्थल को फलों, फूलों व जंगली वनस्पतियों की ‘माटोली’ बनाकर खास तौर पर सजाया जाता है।
कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में उत्सव का विस्तार
कर्नाटक में गणेश उत्सव को ‘गौरी हब्बा’ से जोड़कर मनाया जाता है, जहां गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व माता पार्वती का पूजन होता है और बप्पा को ‘कड़ाबू’ (विशेष मोदक) का भोग लगता है। बेंगलुरु और हुबली में इसके विशाल पंडाल सजते हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 3 से 11 दिनों के इस उत्सव में हैदराबाद के खैराताबाद गणेश की गगनचुंबी विशालकाय प्रतिमा आकर्षण का मुख्य केंद्र रहती है, जिसका विसर्जन हुसैन सागर झील में भव्य जुलूस के साथ किया जाता है।
तमिलनाडु और केरल में विनायक चतुर्थी
तमिलनाडु में यह पर्व ‘विनायक चतुर्थी’ के रूप में 1 से 3 दिन तक मनाया जाता है, जहां मंदिरों और घरों में शुद्ध सफेद मिट्टी की पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और भगवान को ‘कोझुकट्टई’ का भोग चढ़ाया जाता है। केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित पझावंगडी गणपति मंदिर और कोच्चि के प्रमुख देवस्थानों में विशेष महापूजा और हाथियों के औपचारिक जुलूस के साथ नारियल व चावल के पारंपरिक पकवान अर्पित किए जाते हैं।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अनूठी झांकियां
मध्य प्रदेश में यह उत्सव पूरे 10 दिनों तक चलता है, जिसमें इंदौर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलों की परंपरा से निकलने वाली चल झांकियां और अनंत चतुर्दशी के जुलूस पूरे देश में विख्यात हैं। भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर में भी भारी रौनक रहती है। छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, भिलाई, दुर्ग, जगदलपुर और अंबिकापुर में बप्पा की विशाल प्रतिमाएं विराजती हैं और अनंत चतुर्दशी की पूरी रात भव्य झांकियों का कारवां निकलता है।
गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के रंग
गुजरात में 10 दिनों तक सूरत, बड़ौदा और अहमदाबाद में बप्पा की विशालकाय प्रतिमाएं सजती हैं और शाम की महाआरती के बाद पंडालों में पारंपरिक गरबा और डांडिया रास का आयोजन होता है। राजस्थान में जयपुर का प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर मुख्य केंद्र रहता है, जहां लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं और हजारों किलो मोदक का महाभोग लगता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज में पिछले कुछ वर्षों से सार्वजनिक पंडालों का चलन तेजी से बढ़ा है, जहां काशी के गंगा घाटों पर बप्पा की भव्य आरती आकर्षण का केंद्र बनती है।
पंजाब, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल
पंजाब के लुधियाना, अमृतसर और जालंधर जैसे शहरों में ढोल की थाप और भांगड़ा करते हुए बप्पा की अगवानी व विसर्जन किया जाता है। बिहार के पटना, गया और मुजफ्फरपुर में भव्य पंडालों के साथ मेधावी छात्रों का सम्मान व सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। झारखंड के जमशेदपुर (कदमा मैदान) का ऐतिहासिक गणेश मेला और रांची-धनबाद के थीम आधारित पंडाल प्रसिद्ध हैं। वहीं पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 1 से 3 दिनों के दौरान बड़े शैक्षणिक, कला और व्यापारिक परिसरों में विशेष पूजा पंडाल सजाए जाते हैं।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का पर्व स्वरूप
उत्तराखंड के मैदानी इलाकों देहरादून और हरिद्वार में इको-फ्रेंडली पंडाल सजाए जाते हैं, जबकि उत्तरकाशी और चमोली के पहाड़ी शिव मंदिरों में विशेष कीर्तन होता है। हिमाचल प्रदेश के शिमला, कांगड़ा और मंडी में पहाड़ी शैली में मिट्टी की छोटी प्रतिमाएं स्थापित कर स्थानीय पकवानों का भोग और भंडारे आयोजित होते हैं। जम्मू के प्राचीन गणेश मंदिरों में विशेष पूजा होती है और तवी नदी में विसर्जन जुलूस निकलता है, वहीं कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित समुदाय घरों में विधि-विधान से पारिवारिक पूजन करता है।
पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक समरसता और आस्था
असम के गुवाहाटी में व्यापारिक व शैक्षणिक प्रतिष्ठानों में असमिया संस्कृति व स्थानीय हस्तशिल्प से पंडाल सजते हैं। अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर और पासीघाट में स्थानीय फूलों व कला के साथ उत्सव मनता है। ईसाई बहुल मेघालय के शिलांग और नोंगपोह में स्थानीय मंदिरों व सांस्कृतिक भवनों में शांतिपूर्ण व भक्तिमय पूजन होता है। मिजोरम की राजधानी आइजोल में हिंदू परिवार व व्यापारी वर्ग घरों में छोटी मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित कर सात्विक भोग वितरण करते हैं। वहीं नागालैंड के दीमापुर और कोहिमा में मारवाड़ी व बंगाली समाज द्वारा पंडाल सजाकर भंडारे आयोजित किए जाते हैं, जिसमें स्थानीय नागा समुदाय भी सौहार्दपूर्वक शामिल होता है।























