जशपुर (उदालक नायडू )
जब पूरा प्रदेश सूरज की तपिश से झुलस रहा है, तब जशपुर अपनी ही धुन में ‘चिल्ड’ नजर आ रहा है। मौसम ने ऐसा यू-टर्न लिया है कि मई की चिलचिलाती धूप गायब हो गई है और उसकी जगह मानसून वाली मखमली ठंडक ने ले ली है। पिछले दो दिनों से हो रही झमाझम बारिश ने पारे को अर्श से फर्श पर ला दिया है। जो तापमान 40 डिग्री को चुनौती दे रहा था, वह अब गिरकर 28 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच अठखेलियां कर रहा है।
इस सुहावने बदलाव के पीछे का असली खिलाड़ी पश्चिमी विक्षोभ और बंगाल की खाड़ी से आ रही नमी है। हवा के कम दबाव की वजह से बनी द्रोणिका ने जशपुर के ऊंचे पहाड़ों पर बादलों का ऐसा डेरा जमाया कि मई में ही बरसात की झड़ी लग गई। जशपुर की भौगोलिक बनावट ही कुछ ऐसी है कि यहां की पहाड़ियां बादलों को अपनी बाहों में भर लेती हैं, जिससे यहां की हवाएं किसी कुदरती ‘एसी’ की तरह महसूस होने लगती हैं।
यही जशपुर की असली पहचान और खासियत है—तभी तो इसे छत्तीसगढ़ का स्विट्जरलैंड कहा जाता है। चाय के बागानों पर तैरती धुंध, घने जंगलों की हरियाली और दनपुरी-रानीदाह जैसे झरनों का शोर इस वक्त किसी जन्नत से कम नहीं लग रहा। मई की दोपहर में जब लोग लू से बच रहे हैं, तब जशपुर वासी इस मानसून सरीखे सुकून का भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि कुदरत का जशपुर को दिया हुआ एक शानदार तोहफा है।

