बिलासपुर:
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (बिलासपुर) में एमएसडब्ल्यू (MSW) की एक छात्रा के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई एक बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हाईकोर्ट ने छात्रा के हाथ पर मिले कुछ निशानों (अक्षरों) को ‘अनुचित साधन’ (नकल) का आधार बनाते हुए उसका पूरा सेकंड सेमेस्टर रद्द किए जाने के मामले में सजा की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
बिलासपुर की रहने वाली कनक सोनी गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएसडब्ल्यू सेकंड सेमेस्टर की छात्रा हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 6 जुलाई 2026 के एक आदेश के तहत छात्रा को कथित नकल के मामले में श्रेणी 9(I)(C) के अंतर्गत वर्गीकृत किया था। इसके तहत उनका पूरा सेकंड सेमेस्टर रद्द कर दिया गया और उन्हें अगले सत्र में संबंधित सेमेस्टर की सभी परीक्षाएं दोबारा देने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद छात्रा द्वारा दायर की गई अपील को भी 3 अगस्त को खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
छात्रा का पक्ष और हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान छात्रा की ओर से तर्क दिया गया कि उसके हाथ पर केवल स्मरण के लिए कुछ अलग-अलग अक्षर लिखे गए थे, लेकिन उसने परीक्षा के दौरान उत्तर लिखने के लिए उनका उपयोग नहीं किया था।
मामلا की सुनवाई कर रहे जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पूरे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द करने का परिणाम बेहद गंभीर होता है और इससे छात्रा का पूरा शैक्षणिक सत्र और भविष्य प्रभावित होता है।
अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि: किसी सामग्री की सिर्फ ‘मौजूदगी’ और परीक्षा के दौरान उसके ‘वास्तविक इस्तेमाल’ में स्पष्ट अंतर होता है।ऐसे मामलों में कथित दुराचार (मिसकंडक्ट), उसके प्रमाण, अनुचित साधन के वास्तविक उपयोग और दी गई सजा की आनुपातिकता (प्रोपोरेशनालिटी) पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है।
हाईकोर्ट के निर्देश और अगली प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने याचिका का सीधे अंतिम निर्णय देने के बजाय छात्रा को केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 की धारा 35 के तहत वैधानिक अपीलीय उपाय का लाभ उठाने को कहा है। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि: छात्रा को 7 कार्यदिवस के भीतर विश्वविद्यालय के समक्ष अपनी अपील दाखिल करनी होगी।विश्वविद्यालय के सक्षम अपीलीय प्राधिकारी को अपील मिलने के 15 दिनों के भीतर एक स्पष्ट, साक्ष्य-आधारित और तर्कपूर्ण निर्णय पारित करना होगा।अपीलीय प्राधिकारी को इस बात की विशेष रूप से जांच करनी होगी कि छात्रा को श्रेणी ‘सी’ में रखने का तथ्यात्मक आधार क्या था, क्या वास्तव में निशानों का उपयोग परीक्षा में हुआ, तथा विभागाध्यक्ष की सिफारिशों का इस पर क्या प्रभाव पड़ता है।























