छत्तीसगढ़ में त्योहारी सीजन से पहले रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है। दाल, आटा, चना और मसालों के दाम बढ़ने के बीच अब उपभोक्ताओं के लिए एक और बदलाव चिंता बढ़ा सकता है। बढ़ती लागत के दबाव में कंपनियां छोटे पैक की कीमत को पहले जैसा बनाए रखने के लिए उसमें मिलने वाली मात्रा कम करने की रणनीति अपना सकती हैं। यानी ग्राहक को पैकेट पहले जितने दाम में मिलता दिखाई दे, लेकिन उसके अंदर सामान कम हो सकता है।
दाल, आटा और मसालों के दाम बढ़े
स्थानीय बाजारों में सफेद चना करीब 100 से बढ़कर 110 रुपये किलो, राजमा 140 से बढ़कर 150 रुपये और उड़द दाल 120 से बढ़कर 130 रुपये किलो तक पहुंच गई है। मूंग दाल करीब 120 रुपये, मसूर 100 रुपये तथा चना दाल और काला चना करीब 95 रुपये किलो बिक रहा है।
मसालों में धनिया के दाम में सबसे ज्यादा उछाल देखने को मिल रहा है। करीब दो महीने पहले 140 रुपये किलो बिकने वाला धनिया अब लगभग 240 रुपये किलो तक पहुंच गया है। वहीं पांच किलो आटे का पैकेट भी करीब 170 से बढ़कर 190 रुपये हो गया है।
त्योहारी सीजन में पहले से ही कपड़े, मिठाई, पूजा सामग्री और अन्य सामान पर खर्च बढ़ जाता है। ऐसे में रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी वस्तुओं के महंगे होने से परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो रहा है।
10, 20 और 50 रुपये के छोटे पैक पर क्यों नजर?
महंगाई के बीच कंपनियों की रणनीति भी उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। डाटा रिसर्च फर्म नीलसन इंडिया के प्रीतम भादुड़ी के मुताबिक 10, 20 और 50 रुपये जैसे छोटे पैक कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इन पैकों की कीमत बढ़ने पर ग्राहक को सामान तुरंत महंगा महसूस हो सकता है।
इसी वजह से कंपनियों के पास पैकेट की कीमत को समान रखते हुए उसकी मात्रा कम करने का विकल्प होता है। इसे आम तौर पर ‘श्रिंकफ्लेशन’ के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई उत्पाद पहले 20 रुपये में 200 ग्राम मिलता था, तो कंपनी कीमत 20 रुपये रखते हुए उसकी मात्रा घटाकर 180 या 190 ग्राम कर सकती है।
इस तरह ग्राहक को पैकेट की कीमत में सीधी बढ़ोतरी नजर नहीं आती, लेकिन उसे पहले की तुलना में कम सामान मिलता है। यानी महंगाई का असर केवल कीमत बढ़ने से नहीं, बल्कि पैक में मिलने वाली मात्रा घटने से भी पड़ सकता है।
बड़े पैक में कीमत बढ़ाना आसान
दूसरी तरफ बड़े पैक में कंपनियों के पास कीमत बढ़ाने की गुंजाइश अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। आधुनिक रिटेल और ई-कॉमर्स में बिकने वाले बड़े पैक पर बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा सीधे ग्राहकों पर डाला जा सकता है।
यही वजह है कि कंपनियां छोटे पैक में कीमत को नियंत्रित रखने और बड़े पैक में कीमत बढ़ाने जैसी अलग-अलग रणनीतियां अपना सकती हैं। ऐसे में ग्राहकों के लिए सिर्फ पैकेट पर लिखी कीमत देखना पर्याप्त नहीं होगा। सामान की प्रति किलो या प्रति ग्राम कीमत और पैकेट में मिलने वाली वास्तविक मात्रा पर भी नजर रखना जरूरी होगा।
राशन दुकानों में सीमित दाल से बढ़ी परेशानी
दालों की बढ़ती कीमतों के बीच राशन दुकानों में सभी प्रकार की दाल उपलब्ध नहीं होने से उपभोक्ताओं की परेशानी और बढ़ रही है। कुछ जगहों पर चना दाल और माह की दाल उपलब्ध है, जबकि अन्य दालों की जरूरत पूरी करने के लिए लोगों को खुले बाजार से खरीदारी करनी पड़ रही है।
किराना कारोबारियों के मुताबिक दाल, आटा और मसालों की कीमत बढ़ने के बाद कई ग्राहक पहले की तुलना में कम मात्रा में सामान खरीद रहे हैं। त्योहारों में बढ़ती मांग के बीच महंगे राशन का असर बाजार में साफ दिखाई दे रहा है।
ग्राहकों के लिए कीमत के साथ मात्रा देखना जरूरी
महंगाई के दौर में उपभोक्ताओं के लिए किसी सामान की सिर्फ एमआरपी देखना पर्याप्त नहीं होगा। छोटे पैक में कितनी मात्रा मिल रही है और बड़े पैक में प्रति किलो या प्रति ग्राम कीमत कितनी पड़ रही है, इसकी तुलना करने पर वास्तविक कीमत का पता चलेगा।
त्योहारी सीजन में जब घर का खर्च पहले ही बढ़ जाता है, ऐसे में दाल-आटा जैसी जरूरी चीजों की कीमत और पैक की मात्रा दोनों पर नजर रखना परिवारों के बजट को संभालने में मदद कर सकता है।























