रायपुर: छत्तीसगढ़ में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार कल्याण के मोर्चे पर एक बेहद सकारात्मक और संतोषजनक हकीकत सामने आई है। राज्य में पिछले तीन वर्षों के दौरान बर्थ रेट यानी जन्मदर और फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर पूरी तरह से स्थिर बनी हुई है, जो राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और आम जनता में आई जागरूकता की एक सुखद तस्वीर पेश करती है। विधानसभा के पटल पर रखे गए आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार अब अनियंत्रित नहीं है, बल्कि यह एक बेहद संतुलित और स्थिर मोड़ पर आ गई है। स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास विभाग द्वारा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों के कारण नागरिक अब छोटे परिवार के महत्व को बखूबी समझ रहे हैं।
आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक प्रति एक हजार की आबादी पर मापी जाने वाली जन्मदर (क्रूड बर्थ रेट) में पिछले सालों की तुलना में स्थिरता दर्ज की गई है। वर्ष २०२३-२४ में राज्य की जन्मदर २२.३ थी, जो वर्ष २०२४-२५ में मामूली रूप से घटकर २२.२ पर आ गई। इसके बाद वर्ष २०२५-२६ और वर्तमान वित्तीय वर्ष २०२६-२७ में १५ जून २०२६ तक की स्थिति में भी यह जन्मदर ठीक २२.२ पर ही टिकी हुई है। जन्मदर का इस तरह एक ही स्तर पर बने रहना यह दर्शाता है कि राज्य में संस्थागत प्रसव (अस्पतालों में डिलीवरी) बढ़ने और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा जमीनी स्तर पर दी जा रही समझाइश के परिणाम अब धरातल पर दिखाई देने लगे हैं।
इसी तरह अगर किसी महिला द्वारा अपने पूरे जीवनकाल में बच्चों को जन्म देने की औसत संख्या यानी कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) की बात करें, तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार इसमें भी अभूतपूर्व स्थिरता देखने को मिल रही है। वर्ष २०२३-२४ से लेकर वर्तमान सत्र २०२६-२७ में १५ जून २०२६ तक की स्थिति में छत्तीसगढ़ की कुल प्रजनन दर लगातार १.९ पर बनी हुई है। जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार १.९ की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) के बेहद करीब है, जिसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में राज्य की जनसंख्या का ढांचा बेहद संतुलित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों पर संसाधनों का अत्यधिक दबाव नहीं पड़ेगा।
इस सुखद स्थिरता के पीछे स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासनों द्वारा किए जा रहे जमीनी प्रयास सबसे बड़ी वजह बनकर उभरे हैं। प्रदेश के आदिवासी अंचलों से लेकर मैदानी इलाकों तक मितानिन बहनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर परिवार नियोजन के आधुनिक तौर-तरीकों, मां और बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य तथा दो बच्चों के बीच सही अंतर रखने के फायदों के बारे में लगातार जागरूक किया जा रहा है। सरकार द्वारा अस्पतालों में दी जा रही मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित प्रसव योजनाओं ने भी इस मोर्चे पर बड़ी भूमिका निभाई है। प्रशासन का मानना है कि शिक्षा के बढ़ते स्तर और इन निरंतर जागरूकता अभियानों की बदौलत ही आज छत्तीसगढ़ जनसंख्या नियंत्रण के मामले में एक आदर्श राज्य बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

