बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पारिवारिक विवाद और अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में बेहद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं। पहले मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक स्थिति की वैधता को चुनौती देने वाले सिविल मुकदमे के लंबित रहने से पत्नी को भरण-पोषण की राशि से वंचित नहीं किया जा सकता। वहीं दूसरे मामले में कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी निरस्त करने के सरकारी आदेश को रद्द करते हुए मामले पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए हैं।
शादी की वैधता से जुड़े मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने भिलाई निवासी पति गोपाल गोपवानी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही भिलाई परिवार अदालत द्वारा पत्नी पूजा गोपवानी और उनकी 11 वर्षीय बेटी के पक्ष में तय 15 हजार रुपये प्रतिमाह की भरण-पोषण राशि को यथावत रखने का आदेश दिया।
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मामले के अनुसार, भिलाई के वैशाली नगर निवासी पूजा गोपवानी ने अपनी और अपनी बेटी के भरण-पोषण के लिए अर्जी दाखिल की थी। परिवार अदालत ने शुरुआत में तीन हजार रुपये प्रतिमाह की अंतरिम सहायता को बढ़ाकर बाद में 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पत्नी ने अपनी पहली शादी की बात छिपाई थी और इस आधार पर विवाह को अमान्य घोषित करने का सिविल मुकदमा लंबित है।
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हाई कोर्ट ने पति की इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि शादी की वैधता का फैसला अलग प्रक्रिया से होगा, लेकिन इस आधार पर जरूरतमंद पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण को नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने माना कि भरण-पोषण का मूल उद्देश्य आश्रितों को तत्काल आर्थिक सहायता देना है और परिवार अदालत ने दोनों पक्षों की आय व आर्थिक स्थिति का सही आकलन करके ही यह राशि तय की है।
उधर, एक अन्य मामले में जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के सागर जिले के खुरई निवासी आयुष सिंह कुर्मी की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत उनकी अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता के पिता स्वर्गीय बलराम सिंह कुर्मी जल संसाधन विभाग में कार्यरत थे।
पिता के निधन के बाद आयुष ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जिसे विभाग ने 28 मार्च 2018 को निरस्त कर दिया था। अधिवक्ता एसपी काले के माध्यम से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के आवेदनों का निपटारा करते समय केवल पुरानी नीतियों का हवाला देकर किसी की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया है कि आवेदक की अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी पर नियमानुसार नए सिरे से विचार कर निर्णय लिया जाए।

