नई दिल्ली। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयादशमी (दशहरा) का पर्व सनातन संस्कृति में अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का संहार किया था और आदिशक्ति मां दुर्गा ने दुराचारी महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया था।
दशहरे का यह उत्सव केवल रावण दहन और आतिशबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार को समाप्त कर शस्त्र, शास्त्र और प्रकृति पूजन का संकल्प लेने का महापर्व है।
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विजयादशमी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियों का गणित
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आश्विन शुक्ल दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जिसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर होगा। प्रदोष काल व्यापिनी दशमी तिथि को आधार मानते हुए विजयादशमी का पर्व मंगलवार, 20 अक्टूबर को ही धूमधाम से मनाया जाएगा।
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दशमी तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर, दोपहर 12:50 बजे
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दशमी तिथि समापन: 21 अक्टूबर, दोपहर 02:11 बजे
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अपराह्न पूजा मुहूर्त: दोपहर 01:02 बजे से दोपहर 03:19 बजे तक
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विजय मुहूर्त (अति शुभ): दोपहर 01:47 बजे से दोपहर 02:33 बजे तक
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रावण दहन: प्रदोष काल (सूर्यास्त के उपरांत)
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शस्त्र पूजन और अपराजिता वंदन: पराक्रम व धर्म रक्षा का विधान
सनातन परंपरा में शस्त्र केवल हिंसा का साधन नहीं, बल्कि आत्मरक्षा, शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।
भगवान राम और मां दुर्गा की परंपरा:
मान्यताओं के अनुसार, लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम ने मां अपराजिता और अपने धनुष-बाण की पूजा की थी। वहीं, महिषासुर वध के बाद देवताओं ने मां भगवती के अस्त्र-शस्त्रों की वंदना की थी।
राजा-महाराजाओं से लेकर आधुनिक सेना तक:
प्राचीन काल में राजा-महाराजा विजयादशमी के दिन सीमा उल्लंघन और नए अभियानों की शुरुआत शस्त्र पूजन से करते थे। आज भी भारतीय सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस थानों में शस्त्र पूजन की भव्य परंपरा निभाई जाती है।
औजार व प्रतिष्ठान पूजन:
व्यापारी, कारीगर और उद्योगपति भी इस दिन अपनी मशीनों, औजारों और कारखानों की पूजा कर कार्य में उन्नति की कामना करते हैं।
ऐसा शायद ही सुना और देखा हो! जहां दशहरा पर नहीं जलते रावण, मातम में डूबती हैं बस्तियां, महिषासुर को अपना राजा और पूर्वज मानकर शोक मनाता है यहाँ का असुर समाज, जानिए अनूठी परंपरा की पूरी दास्तानशमी वृक्ष पूजन: पांडवों के अस्त्र और शनि दोष से मुक्ति
दशहरे के दिन शमी (खेजड़ी) के पेड़ की पूजा का विशेष विधान है:
महाभारत कालीन कथा:
अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने दिव्यास्त्र शमी के पेड़ की शाखाओं में छिपाए थे। अज्ञातवास समाप्ति के बाद उन्होंने शमी की पूजा कर अस्त्र पुनः प्राप्त किए और कौरवों पर विजय पाई।
श्रीराम का आभार:
रावण वध के बाद भगवान राम ने भी शमी वृक्ष की पूजा कर विजय का आशीष लिया था।
ज्योतिषीय मान्यता:
दशहरे पर शमी के दर्शन-पूजन से शत्रुओं का दमन होता है, घर से नकारात्मकता समाप्त होती है तथा शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभावों से शांति मिलती है।
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परंपराएं जो बनाती हैं दशहरे को खास
नीलकंठ पक्षी का दर्शन:
नीलकंठ को भगवान शिव का प्रतिनिधि माना गया है। लंका विजय पर निकलते समय प्रभु श्रीराम को नीलकंठ के दर्शन हुए थे। दशहरे पर इस पक्षी के दर्शन को भाग्योदय और धन-धान्य का सूचक माना जाता है।
विजय का सूचक ‘पान का बीड़ा’:
रावण दहन के उपरांत हनुमान जी को मीठी बूंदी और मीठा पान अर्पित करने के बाद पान खाने और खिलाने की अनूठी परंपरा है। यह सत्य की जीत के उल्लास, आपसी प्रेम और मान-सम्मान का प्रतीक है।


