विशेष आलेख (पुण्यतिथि विशेष)
31 जुलाई 1980—यह वह काली तारीख थी जब भारतीय संगीत का सूरज हमेशा के लिए ढल गया। पर क्या रफ़ी साहब सचमुच चले गए? नहीं! 46 साल बीत जाने के बाद भी, जब किसी चाय की टपरी पर ‘गुलाबी आंखें’ बजता है, या किसी तन्हा दिल से ‘क्या हुआ तेरा वादा’ की आह निकलती है, तो महसूस होता है कि मोहम्मद रफ़ी आज भी हमारे बीच उतने ही ज़िंदा हैं जितने अपने दौर में थे।
रफ़ी साहब महज़ एक गायक नहीं थे, वे हर जज्बात के ‘थर्मामीटर’ थे। उन्होंने खुशी को सुर दिए, दर्द को सहलाया और रोमांस को अमर बना दिया। आइए, उनकी पुण्यतिथि पर नज़र डालते हैं उनके उन सदाबहार नगमों और उनसे जुड़े अनसुने किस्सों पर, जिन्होंने हिंदी सिनेमा के इतिहास को सुनहरे अक्षरों में लिख दिया:
1. गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं (द ट्रेन, 1970)
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संगीत: आर. डी. बर्मन | गीतकार: आनंद बख्शी
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कलाकार: राजेश खन्ना और नंदा
किस्सा/खासियत: यह गाना न केवल 70 के दशक का सुपर-डुपर हिट था, बल्कि आज के युवाओं और क्लब्स की ‘प्लेलिस्ट’ में भी सिर चढ़कर बोलता है। कहा जाता है कि इस गाने के लिए पंचमदा (आर. डी. बर्मन) को जो मखमली और मस्ती भरा अंदाज़ चाहिए था, रफ़ी साहब ने उसे महज़ एक ही टेक में रिकॉर्ड कर दिया था। रफ़ी साहब की सबसे बड़ी महारत यही थी—स्टूडियो में कदम रखते ही वे गाने की आत्मा को पकड़ लेते थे।
2. बाहों में चले आओ (अनामिका, 1973)
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संगीत: आर. डी. बर्मन | गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी
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कलाकार: संजीव कुमार और जया भादुरी (बच्चन)
किस्सा/खासियत: हालांकि यह गाना मुख्य रूप से लता मंगेशकर की मखमली और धीमी आवाज़ के जादू के लिए जाना जाता है, लेकिन इसमें रफ़ी साहब और लता जी की जुगलबंदी ने जो अहसास पैदा किया, उसने भारतीय सिनेमा में ‘रोमांटिक गीतों’ का स्तर ही बदल दिया। दबी-दबी आवाज़ में प्यार का इज़हार कैसे किया जाता है, यह गीत उसकी सबसे बेहतरीन मिसाल है।
3. क्या हुआ तेरा वादा (हम किसी से कम नहीं, 1977)
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संगीत: आर. डी. बर्मन | गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी
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कलाकार: तारिक खान (साथ में ऋषि कपूर, काजल किरण)
किस्सा/खासियत: टूटे हुए दिल की टीस और शिकायत को अगर कोई आवाज़ मुकम्मल कर सकती थी, तो वह रफ़ी साहब की ही थी। अभिनेता तारिक पर फिल्माए गए इस दर्द भरे गीत के लिए मोहम्मद रफ़ी को ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ (National Film Award) और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दोनों से नवाज़ा गया था। जब रफ़ी साहब उच्च स्वर (High Pitch) में “याद है मुझको, तुने कहा था…” गाते हैं, तो सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
4. अभी न जाओ छोड़ कर (हम दोनों, 1961)
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संगीत: जयदेव | गीतकार: साहिर लुधियानवी
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कलाकार: देव आनंद और साधना
किस्सा/खासियत: इसे अगर हिंदी सिनेमा का “सर्वश्रेष्ठ प्रेम गीत” कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। साहिर की शायरी, जयदेव की सरल-सुगम धुन और रफ़ी-आशा की सुरीली जुगलबंदी! देव आनंद की चुलबुली अदाकारी और रफ़ी साहब की आवाज़ में छिपी ‘इल्तजा’ (गुज़ारिश) ने इस गाने को युगों-युगों के लिए अमर बना दिया। आज भी जब कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी को रोकना चाहता है, तो यही नगमा जुबां पर आता है।
5. लिखे जो खत तुझे (कन्यादान, 1968)
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संगीत: शंकर-जयकिशन | गीतकार: हसरत जयपुरी
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कलाकार: शशि कपूर और आशा पारेख
(नोट: यह गीत 1968 की फिल्म ‘कन्यादान’ का है)
किस्सा/खासियत: पत्राचार और चिट्ठियों के उस दौर में यह गाना हर आशिक का राष्ट्रगान बन गया था। शंकर-जयकिशन के कर्णप्रिय संगीत में रफ़ी साहब ने जब “हज़ारों रंग के नजारे बन गए…” को अपनी आवाज़ में ढाला, तो रिकॉर्डिंग स्टूडियो में मौजूद हर शख्स भावुक हो उठा था। इस गीत ने सिखाया कि शब्द जब रफ़ी साहब के गले से निकलते हैं, तो वे सिर्फ शब्द नहीं रहते, इबादत बन जाते हैं।
एक युग का अंत, पर अजर-अमर आवाज़
31 जुलाई 1980 को जब मुंबई में भारी बारिश के बीच रफ़ी साहब की अंतिम यात्रा निकली थी, तो सड़कों पर हज़ारों की भीड़ रो रही थी। दिग्गज संगीतकार नौशाद साहब ने तब कहा था—
“कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया,
साहिल पुकारता है, समुंदर चला गया।”
मोहम्मद रफ़ी सिर्फ एक फनकार नहीं थे; वे विनम्रता, सादगी और सुरों के पर्याय थे। समय बदलेगा, दौर बदलेंगे, लेकिन जब-जब इंसान मोहब्बत करेगा, उदास होगा या जश्न मनाएगा… रफ़ी साहब की आवाज़ हमेशा बैकग्राउंड में बजती रहेगी।
मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और गायकी के कुछ ऐसे अनछुए और बेहद दिलचस्प पहलू, जो उनके प्रशंसकों के दिलों को छू लेते हैं:
1. बचपन में फकीर की आवाज से जागा था संगीत का शौक
रफ़ी साहब का जन्म पंजाब के अमृतसर के पास ‘कोटला सुल्तान सिंह’ गांव में हुआ था। बचपन में उनके गांव में हर दिन एक फकीर आया करता था, जो गलियों में गाकर भीख मांगता था। नन्हें रफ़ी उस फकीर की सुरीली आवाज से इतने प्रभावित हुए कि वे छुप-छुपकर उनके पीछे-पीछे चलते और उनकी नकल उतारते थे। वहीं से उनके भीतर का गायक पहली बार जागा।
2. बिजली जाने पर मिला पहला बड़ा मौका
रफ़ी साहब को उनका पहला सार्वजनिक मंच (Performance) सिर्फ 13 साल की उम्र में मिला था। लाहौर में के. एल. सहगल (K. L. Saigal) का एक शो था। अचानक शो के दौरान बिजली (Power Outage) चली गई। भीड़ बेकाबू होने लगी, तब आयोजकों ने माहौल संभालने के लिए छोटे से बच्चे रफ़ी को स्टेज पर गाना गाने के लिए भेजा। रफ़ी साहब ने बिना माइक के ऐसी तान छेड़ी कि पूरी भीड़ शांत होकर उन्हें सुनती रह गई। दर्शकों में बैठे दिग्गज संगीतकार श्याम सुंदर ने उनका हुनर पहचाना और उन्हें बॉम्बे (मुंबई) आने का न्योता दिया।
3. ‘रियाज़’ के मामले में सबसे पक्के और अनुशासित
रफ़ी साहब को ‘सुरों का देवता’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। जब वे सफलता के शिखर पर थे, तब भी उनका नियम कभी नहीं बदला। वे रोज तड़के सुबह 3:00 बजे उठते थे और घंटों शास्त्रीय संगीत का रियाज़ (Practice) करते थे। संगीतकार शंकर-जयकिशन ने एक बार कहा था, “रफ़ी साहब को कभी किसी गाने के लिए रिहर्सल की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, वे स्टूडियो आते ही गाना ऐसे गाते थे जैसे बरसों से उसे जानते हों।”
4. दान-पुण्य और सादगी: जिसे दाहिने हाथ की खबर बाएं हाथ को न हो
रफ़ी साहब जितने महान कलाकार थे, उससे भी बड़े इंसान थे। वे बेहद धार्मिक, शांत और शर्मीले स्वभाव के थे।
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वे कई गरीब संगीतकारों, बैकग्राउंड म्यूजिशियंस और तकनीशियनों की आर्थिक मदद गुप्त रूप से करते थे।
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कई बार छोटे और गरीब निर्माताओं के लिए वे बिना एक भी पैसा (फीस) लिए गाने रिकॉर्ड कर देते थे।
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वे पार्टी-शार्टी और बॉलीवुड की चकाचौंध से हमेशा दूर रहते थे। रिकॉर्डिंग खत्म होते ही सीधे अपने परिवार के पास घर लौट आते थे।
5. एक ही दिन में रिकॉर्ड किए 10-10 गाने!
आज के दौर में एक गाना रिकॉर्ड होने में कई दिन लग जाते हैं, लेकिन रफ़ी साहब के दौर में आर्केस्ट्रा और गायक एक साथ लाइव रिकॉर्डिंग करते थे। अपनी कमाल की ग्रैस्पिंग पावर (जल्दी सीखने की क्षमता) के कारण रफ़ी साहब एक ही दिन में 6 से 10 अलग-अलग भाषाओं और मिजाज के गाने रिकॉर्ड कर लिया करते थे।
6. हर अभिनेता के लिए बदल लेते थे अपनी आवाज़ का ‘टेक्सचर’
रफ़ी साहब की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे जिस अभिनेता के लिए गाते थे, अपनी आवाज़ की टोन (Tone) और स्टाइल बिल्कुल वैसी ही बना लेते थे:
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शम्मी कपूर के लिए गाते वक्त उनकी आवाज़ में वो पागलपन और मस्ती आ जाती थी।
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देव आनंद के लिए गाते समय उनकी आवाज़ में एक खास स्टाइल और नज़ाकत होती थी।
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दिलीप कुमार के लिए गाते समय उनकी आवाज़ में संजीदगी और दर्द झलकने लगता था।
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महमूद या कॉमेडी दृश्यों में वे अजीबोगरीब हरकतों वाली आवाज निकाल लेते थे।
शम्मी कपूर ने तो एक बार कहा था, “जब रफ़ी साहब का निधन हुआ, तो मुझे लगा जैसे मेरी अपनी आवाज़ छीन ली गई है।”
7. पतंगबाजी के जबरदस्त शौकीन
काम के दबाव से दूर रहने के लिए रफ़ी साहब का सबसे पसंदीदा मशगूलियत (हॉबी) थी पतंगबाजी। जब भी उन्हें रिकॉर्डिंग से फुर्सत मिलती, वे अपने घर की छत पर जाकर घंटों पतंग उड़ाते थे। मुंबई के आसमान में अपनी पतंग से दूसरों की पतंग काटने में उन्हें बच्चों जैसी खुशी मिलती थी।

