छत्तीसगढ़ शासन ने वर्ष 2027 के लिए सार्वजनिक और ऐच्छिक अवकाशों की घोषणा की
बिलासपुर:
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने तीन अलग-अलग महत्वपूर्ण मामलों में अहम फैसले सुनाए हैं। अदालत ने रेलवे भूमि अधिग्रहण में विस्थापित को तत्कालीन नीति के तहत रोजगार सहायता देने, अनुदान प्राप्त स्कूल के शिक्षक को एक महीने के भीतर ग्रेच्युटी जारी करने का निर्देश दिया है। वहीं, एक अन्य पारिवारिक मामले में स्पष्ट किया कि पत्नी के कोर्ट न आने मात्र से पति का एकतरफा दावा सही नहीं मान लिया जाएगा।
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रेलवे भू-विस्थापित को राहत: अधिग्रहण के समय लागू नीति से ही मिलेगा रोजगार सहायता का लाभ
मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगलपीठ ने रेलवे की याचिका खारिज करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) जबलपुर के आदेश को बरकरार रखा है।
मध्य प्रदेश के सिवनी निवासी भारतलाल सनोडिया की जमीन रेलवे परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी, जिसके एवज में उन्होंने रोजगार सहायता की मांग की थी। अधिकरण ने उनके दावे पर पुनर्विचार के निर्देश दिए थे। रेलवे ने दलील दी कि 16 जुलाई 2010 की नीति की जगह 11 नवंबर 2019 को नई नीति लागू हो चुकी है, जिसमें नौकरी के स्थान पर एकमुश्त नकद मुआवजा दिया जाता है। इसलिए पुरानी नीति के तहत दावा मान्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जमीन का अधिग्रहण हुआ था, तब 2010 की नीति प्रभावी थी। 2019 की नीति को भूतलक्षी (पिछली तारीख से) प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने रेलवे को निर्धारित समय-सीमा के भीतर पात्रता की जांच कर रोजगार आदेश जारी करने का निर्देश दिया।
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सेवानिवृत्त शिक्षक के पक्ष में फैसला: 30 दिनों में करना होगा ₹19.92 लाख ग्रेच्युटी का भुगतान
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने 100 प्रतिशत सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल के शिक्षक नंदकुमार वर्मा को राहत देते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को 30 दिनों के भीतर ग्रेच्युटी राशि भुगतान करने का आदेश दिया है।
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम कोसमंदी निवासी नंदकुमार वर्मा के पक्ष में ग्रेच्युटी भुगतान प्राधिकारी ने 4 सितंबर 2023 को 19 लाख 92 हजार 217 रुपये की राशि स्वीकृत की थी। राजस्व वसूली प्रमाणपत्र जारी होने के बावजूद शिक्षा विभाग ने भुगतान रोक रखा था।सरकार ने दावा किया कि संबंधित स्कूल ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के दायरे में नहीं आता, इसलिए प्राधिकारी का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
अदालत ने कहा कि जब शासन ने प्राधिकारी के मूल आदेश को किसी सक्षम उच्च फोरम में चुनौती नहीं दी और वसूली प्रमाणपत्र भी जारी हो चुका है, तो प्रशासनिक ढिलाई के चलते शिक्षक को उसके वैध वित्तीय लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता।
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वैवाहिक विवाद: पत्नी के गैर-हाजिर रहने पर भी पति को साबित करना होगा अलग रहने का अकारण आधार
न्यायमूर्ति पी.पी. साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की युगलपीठ ने अंबिकापुर कुटुंब न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली पति की अपील खारिज कर दी।
सिद्धार्थ यादव और मधु यादव का विवाह 2017 में हुआ था। पति का आरोप था कि पत्नी मार्च 2020 में बेटी को लेकर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी। पति ने दांपत्य अधिकारों की बहाली (वैवाहिक संबंध फिर से शुरू करने) के लिए कुटुंब न्यायालय में अर्जी लगाई थी। कुटुंब न्यायालय में पत्नी उपस्थित नहीं हुई थी और उसके खिलाफ एकतरफा कार्यवाही हुई थी। पति का कहना था कि चूंकि उसके बयान का कोई विरोध नहीं हुआ, इसलिए अदालत को उसके पक्ष में फैसला देना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने अंबिकापुर फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पत्नी के उपस्थित न होने या जिरह न करने से पति का पक्ष स्वतः सत्य नहीं हो जाता। पति द्वारा पेश दस्तावेजों में ही प्रताड़ना की वजह से अलग रहने की बात सामने आई थी। साथ ही पति ने पत्नी को वापस लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया और करीब 1 साल 9 महीने बाद याचिका लगाई। अदालत ने माना कि वैवाहिक संबंध बहाली के लिए पति को पुख्ता साक्ष्यों से सिद्ध करना होगा कि पत्नी बिना किसी वाजिब कारण के अलग रह रही है।


