देश में चाय की थड़ी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक हर जगह डिजिटल भुगतान का पर्याय बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर इन दिनों सियासी पारा चढ़ा हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से 14 सितंबर को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट के तहत जारी एक नई गजट अधिसूचना के बाद यह बहस छिड़ गई है कि क्या अब ₹2,000 से अधिक के डिजिटल लेन-देन पर अतिरिक्त चार्ज लगेगा। अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि ₹2,000 तक के यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड भुगतानों पर किसी भी बैंक या पेमेंट प्रोवाइडर द्वारा कोई शुल्क नहीं वसूला जाएगा। हालांकि, जैसे ही ₹2,000 की कानूनी सीमा तय हुई, वैसे ही विपक्ष और अर्थशास्त्रियों के बीच यह सवाल खड़ा हो गया कि इस तय सीमा से ऊपर के लेन-देन का भविष्य क्या होगा और क्या इसका बोझ सीधे दुकानदार या ग्राहक की जेब पर पड़ने वाला है।
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इस मुद्दे को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित पार्टी के शीर्ष नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ₹2,000 से अधिक के व्यापारिक लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की कानूनी जमीन तैयार कर रही है। विपक्ष का दावा है कि संख्या के लिहाज से भले ही ₹2,000 से ऊपर के भुगतान कुल यूपीआई लेन-देन का मात्र 5 फीसदी हैं, लेकिन कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू में इनकी हिस्सेदारी लगभग 65 फीसदी बैठती है। विपक्ष ने सोशल मीडिया पर 0.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त वसूली का दावा करते हुए सीधा सवाल दागा कि यदि बैंकों ने दुकानदारों से एमडीआर के रूप में कमीशन काटना शुरू किया, तो कोई भी व्यापारी इसे अपनी जेब से नहीं भरेगा और अंततः वह सामान के दाम बढ़ाकर यह पूरा बोझ आम ग्राहक की जेब पर ही डालेगा।
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विपक्ष के आरोपों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी तुरंत मोर्चा संभाला और इसे जनता को गुमराह करने वाली ‘फेक न्यूज’ करार दिया। सत्ता पक्ष और सरकारी प्रवक्ताओं ने साफ किया कि सरकार ने आम उपभोक्ताओं पर किसी भी प्रकार का यूजर चार्ज लगाने का कोई फैसला नहीं किया है। वित्त मंत्रालय और संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पहले दिए गए बयानों का हवाला देते हुए दोहराया गया कि आम जनता, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे खुदरा व्यापारियों के लिए यूपीआई सेवाएं पूरी तरह निशुल्क रहेंगी। इसके अलावा, एक सामान्य नागरिक द्वारा दूसरे नागरिक को भेजे जाने वाले पैसे (P2P लेन-देन) पर ₹2,000 की कोई सीमा लागू नहीं है और यह हमेशा की तरह शत-प्रतिशत मुफ्त बना रहेगा।
इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और यूपीआई के वित्तीय ढांचे के इर्द-गिर्द घूमती है। वर्तमान में बैंकों, फिनटेक कंपनियों और पेमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के 22 प्रतिनिधियों वाली स्टीयरिंग कमेटी इस बात का अध्ययन कर रही है कि डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को बिना घाटे के आत्मनिर्भर कैसे बनाए रखा जाए। दुनिया के अन्य देशों जैसे ब्राजील (PIX में 0.33%) और चीन (औसतन 0.40%) में डिजिटल पेमेंट्स पर मर्चेंट चार्ज लगता है, लेकिन भारत में सरकार अब तक इसे पूरी तरह सब्सिडी देकर मुफ्त रखे हुए है। अधिसूचना में ₹2,000 की कानूनी सुरक्षा देकर छोटे भुगतानों को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया गया है, लेकिन बड़े मर्चेंट भुगतानों पर यदि भविष्य में कोई नीतिगत फैसला लिया भी जाता है, तो सबसे बड़ा आर्थिक पेच यही रहेगा कि उस शुल्क का अंतिम बोझ व्यापारी खुद उठाएगा या फिर ग्राहकों से वसूलेगा।























