नागपुर:
क्या बेटी के 18 वर्ष का होते ही पिता का आर्थिक दायित्व समाप्त हो जाता है? बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने इस सवाल पर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि अविवाहित बालिग बेटी आत्मनिर्भर नहीं है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो पिता की जिम्मेदारी केवल 18 साल की उम्र पूरी होने से खत्म नहीं होती।
जस्टिस मेहरोज के. पठान की एकल पीठ ने ‘आनंद हरिश्चंद्र चौहान बनाम श्रीमती शैला एवं अन्य’ मामले में सुनवाई करते हुए पिता की पुनर्विचार याचिका (रिवीजन पिटीशन) खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता को दोनों बच्चों को हर महीने 7,000-7,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
महाराष्ट्र के इस मामले में याचिकाकर्ता पिता पेशे से शिक्षक है और उसका मासिक वेतन करीब 71,000 रुपये है। विवाद के बाद अलग रह रहे बालिग बेटे और बेटी ने नागपुर फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ते की अर्जी लगाई थी।
फैमिली कोर्ट ने 7 दिसंबर 2019 को पिता को दोनों बच्चों के लिए 7,000-7,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।पिता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसकी दलील थी कि दोनों बच्चे बालिग हो चुके हैं, कानूनन वे मेंटेनेंस के हकदार नहीं हैं और उस पर अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की भी जिम्मेदारी है।पिता का तर्क था कि बेटी बालिग होने के बाद केवल हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) की धारा 20(3) के तहत ही दावा कर सकती है, सीआरपीसी की धारा 125 के तहत नहीं।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां: बेटियों के कानूनी अधिकार पर मुहर
शादी तक भरण-पोषण का अधिकार:
अदालत ने माना कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) की धारा 20(3) के तहत अविवाहित हिंदू बेटी को बालिग होने के बाद भी अपनी शादी होने तक माता-पिता से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार प्राप्त है, बशर्ते वह खुद कमाने में सक्षम न हो।
तकनीकी आधार पर राहत से इनकार नहीं:
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि HAMA के तहत दूसरा कानूनी उपाय उपलब्ध होना बेटी को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत राहत पाने से नहीं रोकता। चूंकि पिता यह साबित करने में विफल रहा कि बेटी अपनी कमाई से खुद का खर्च उठा सकती है, इसलिए वह भरण-पोषण की पूरी हकदार है।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के जगदीश जुगतावत बनाम मंजू लता और अभिलाषा बनाम प्रकाश मामलों का हवाला दिया, जिनमें तय किया गया था कि अविवाहित पुत्री के बालिग होने पर भी उसकी शादी होने तक पिता को आर्थिक मदद करनी होगी।
जस्टिस पठान ने रेखांकित किया कि फैमिली कोर्ट के आदेश के समय बेटा नाबालिग था। बाद में उसके बालिग हो जाने मात्र से मूल आदेश गलत नहीं ठहराया जा सकता और पिता अपनी देनदारी से तुरंत पल्ला नहीं झाड़ सकता।
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला उन अविवाहित बेटियों के लिए बड़ा संबल है, जो बालिग होने के बावजूद उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं या करियर निर्माण के दौर में हैं और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाई हैं। अदालत ने साफ कर दिया कि जब तक बेटी अपने पैरों पर खड़ी नहीं होती या उसका विवाह नहीं हो जाता, तब तक सक्षम पिता का भरण-पोषण का कर्तव्य कानूनी रूप से बना रहेगा।


