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रायपुर: छत्तीसगढ़ में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने जा रहा है। प्रदेश में एक साथ 250 नई एमबीबीएस (MBBS) सीटों का विस्तार होने जा रहा है। गीदम (दंतेवाड़ा), कुनकुरी (जशपुर), मनेन्द्रगढ़, जांजगीर-चांपा और कबीरधाम में 50-50 सीटों वाले 5 नए शासकीय मेडिकल कॉलेजों को शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्वीकृति मिल गई है।लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं थी। जनवरी से लेकर जून तक इस प्रोजेक्ट में कई बड़े मोड़ आए। आइए जानते हैं कि कैसे आई थी बाधा और फिर सरकार की तत्परता से कैसे मिला यह बड़ा तोहफा:
छत्तीसगढ़ में एक साथ पांच नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और उनमें दो सौ पचास एमबीबीएस सीटों का विस्तार होना राज्य के चिकित्सा इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना है। लेकिन इस बड़े मुकाम तक पहुँचने का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसकी शुरुआत साल २०२६ की शुरुआत में हुई थी।
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जनवरी २०२६ में जब छत्तीसगढ़ सरकार की संबंधित संस्थाओं ने गीदम (दंतेवाड़ा), कुनकुरी (जशपुर), मनेन्द्रगढ़, जांजगीर-चांपा और कबीरधाम में पचास-पचास सीटों वाले नए शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को ऑनलाइन आवेदन भेजा, तब चारों ओर एक नई उम्मीद की किरण जगी थी। इस कदम का मुख्य उद्देश्य राज्य के सुदूर और आदिवासी अंचलों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुँचाना और स्थानीय युवाओं के डॉक्टर बनने के सपने को साकार करना था।
तैयारियां चल ही रही थीं कि जून २०२६ में राज्य सरकार को एक बहुत बड़ा झटका लगा। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने शुरुआती कागजी जांच के बाद इस ऑनलाइन आवेदन को अमान्य यानी खारिज कर दिया। इस रिजेक्शन के पीछे कुछ गंभीर तकनीकी और व्यावहारिक कमियां थीं, जिनमें मुख्य रूप से वित्तीय मापदंडों से जुड़ा शोधन क्षमता प्रमाण-पत्र (सॉल्वेन्सी सर्टिफिकेट), कॉलेज भवनों और जरूरी लैब का अधूरा बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) तथा विश्वविद्यालय से मिलने वाले संबद्धता प्रमाण-पत्र की अनुपलब्धता शामिल थी। आवेदन खारिज होने से एक बारगी ऐसा लगने लगा था कि शैक्षणिक सत्र २०२६-२७ में इन कॉलेजों की शुरुआत पूरी तरह खटाई में पड़ जाएगी और सैकड़ों छात्रों का एक साल बर्बाद हो जाएगा।
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इस बड़ी बाधा के सामने आते ही राज्य सरकार ने बिना समय गंवाए तुरंत एक्शन मोड में आने का फैसला किया। जून के मध्य में जैसे ही निरस्तीकरण की बात सामने आई, स्वास्थ्य विभाग और शासन स्तर पर युद्ध स्तर पर काम शुरू कर दिया गया। अधिकारियों और कॉलेज प्रबंधनों ने दिन-रात एक करके एनएमसी द्वारा बताई गई सभी कमियों को दूर किया, जरूरी दस्तावेजों को आनन-फानन में तैयार किया और निर्माण कार्यों की रफ्तार बढ़ाकर सभी वांछित दस्तावेज दोबारा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को सौंप दिए। सरकार की इस त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई ने ठंडे बस्ते में जा रहे इस बड़े प्रोजेक्ट को दोबारा जिंदा कर दिया।
जब सरकार ने अपनी ओर से सारी कमियां दुरुस्त कर लीं, तब इस पूरे मिशन की अंतिम परीक्षा का समय आया। राज्य सरकार के दावों और दस्तावेजों की जमीनी हकीकत परखने के लिए एनएमसी की डॉक्टरों और विशेषज्ञों की टीम खुद मैदान में उतरी। इस टीम ने २४ जून २०२१ को सबसे पहले मनेन्द्रगढ़ और जांजगीर-चांपा के मेडिकल कॉलेजों का गहन भौतिक निरीक्षण किया। इसके ठीक अगले दिन यानी २५ जून २०२६ को टीम ने कबीरधाम, दंतेवाड़ा और कुनकुरी (जशपुर) के महाविद्यालयों का भी मुआयना किया, जहाँ उन्होंने बुनियादी ढांचे, उपकरणों और व्यवस्थाओं को बारीकी से जांचा।
विधानसभा में १५ जुलाई २०२६ को स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्पष्ट किया कि यह भौतिक निरीक्षण पूरी तरह संपन्न हो चुका है और शुरुआती अड़चनों को दूर करने के बाद अब इन कॉलेजों को अंतिम मान्यता देने की वैधानिक कार्यवाही सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रही है। इस प्रकार, एक समय पर रद्द होने की कगार पर खड़े ये पांचों मेडिकल कॉलेज सरकार की मुस्तैदी और कड़ी मेहनत की बदौलत आज शुरू होने की अंतिम दहलीज पर आ पहुंचे हैं।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा जून 2026 में छत्तीसगढ़ के 5 नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों के ऑनलाइन आवेदन को पहली बार में अमान्य करने के पीछे जो तीन मुख्य तकनीकी कमियां थीं, उनकी विस्तृत व्याख्या इस प्रकार है:
शोधन क्षमता प्रमाण-पत्र (Solvency Certificate) में कमी
किसी भी नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए यह प्रमाण-पत्र बेहद महत्वपूर्ण होता है, जो यह प्रमाणित करता है कि संबंधित संस्था या सरकार के पास कॉलेज को सुचारू रूप से चलाने और भविष्य में आने वाले खर्चों को वहन करने के लिए पर्याप्त वित्तीय मजबूती है। एनएमसी की शुरुआती जांच में पाया गया कि इन कॉलेजों के वित्तीय तकनीकी मापदंड तय नियमों के अनुरूप नहीं थे। आवेदन के समय प्रस्तुत किए गए वित्तीय दस्तावेजों या सॉल्वेन्सी सर्टिफिकेट में कुछ ऐसी तकनीकी खामियां थीं, जिससे आयोग इन कॉलेजों की दीर्घकालिक वित्तीय सुदृढ़ता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सका। इसी वित्तीय स्पष्टता की कमी को एनएमसी ने एक बड़ी बाधा माना।
अधोसंरचना (Infrastructure) का अधूरा होना
एक आदर्श मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए एनएमसी के कड़े मानक होते हैं, जिसके तहत छात्रों के लिए सर्वसुविधायुक्त क्लासरूम, आधुनिक प्रयोगशालाएं (लैब्स), हॉस्टल, प्रशासनिक भवन और अस्पताल में मरीजों के लिए पर्याप्त बेड होना अनिवार्य है। जून 2026 में जब एनएमसी ने आवेदन की समीक्षा की, तब इन पांचों स्थानों पर चल रहे निर्माण कार्य पूरी तरह मुकम्मल नहीं हो पाए थे। कई जगहों पर बिल्डिंग्स का ढांचा तो तैयार था, लेकिन मेडिकल कॉलेज शुरू करने के लिए जो जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर और सेटअप तुरंत चाहिए होता है, उसमें कमियां पाई गईं। आयोग का मानना था कि अधूरी अधोसंरचना के साथ नए सत्र के छात्रों की पढ़ाई और प्रैक्टिकल सुचारू रूप से शुरू नहीं किए जा सकते।
संबद्धता प्रमाण-पत्र (Affiliation Certificate) का पेंडिंग होना
किसी भी चिकित्सा महाविद्यालय को संचालित करने के लिए उसे किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा विश्वविद्यालय (Medical University) या संबंधित सरकारी विभागों से संबद्ध होना अनिवार्य होता है। यह प्रमाण-पत्र इस बात की कानूनी गारंटी होता है कि कॉलेज का पाठ्यक्रम और परीक्षाएं तय नियमों के अनुसार आयोजित की जाएंगी। एनएमसी के पास जब ऑनलाइन आवेदन पहुंचा, तब तक इन पांचों प्रस्तावित कॉलेजों को संबंधित यूनिवर्सिटी या विभागों से मिलने वाले कुछ जरूरी एग्रीमेंट्स, अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) और औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाई थीं। इन आवश्यक सर्टिफिकेशन्स के पेंडिंग होने के कारण आयोग ने इसे नियमों का उल्लंघन माना और आवेदन को अमान्य कर दिया।
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यही वे तीन मुख्य कारण थे जिनकी वजह से एक समय पर इन कॉलेजों की मान्यता खटाई में पड़ती दिख रही थी, जिसे बाद में सरकार ने तत्परता दिखाते हुए युद्ध स्तर पर दुरुस्त किया। शुरुआती तकनीकी बाधाओं और विपक्ष के तीखे हमलों के बीच छत्तीसगढ़ को इन 5 नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सौगात कैसे मिली, इसकी पूरी कहानी प्रशासनिक मुस्तैदी और त्वरित फैसलों पर टिकी है।
विपक्ष के हमलों का इंतजार किए बिना राज्य सरकार और संबंधित कॉलेज प्रबंधनों ने आपातकालीन बैठकें बुलाईं। इन बैठकों में एनएमसी द्वारा उठाई गई एक-एक आपत्ति पर विस्तार से चर्चा की गई। शासन स्तर पर त्वरित फैसले लेते हुए वित्तीय तकनीकी मापदंडों को सुधारा गया, जरूरी बजट और संसाधन जारी कर बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) को पूरा किया गया और पेंडिंग पड़े संबद्धता प्रमाण-पत्रों (Affiliation Certificates) से जुड़ी तमाम कानूनी औपचारिकताओं को फटाफट क्लियर कराया गया। इस मुस्तैदी का नतीजा यह हुआ कि सभी मांगे गए (वांछित) दस्तावेज और कमियों को रिकॉर्ड समय में दुरुस्त करके दोबारा एनएमसी के समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया।
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जब कागजी कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी और एनएमसी के मानकों के अनुरूप दुरुस्त हो गई, तो आयोग ने भी इस पर आगे कदम बढ़ाया। जून के आखिरी हफ्ते में एनएमसी की विशेषज्ञ टीमों ने जमीनी हकीकत परखने के लिए सभी पांचों लोकेशंस (मनेन्द्रगढ़, जांजगीर-चांपा, कबीरधाम, दंतेवाड़ा और कुनकुरी) का दौरा किया और वहां का व्यापक भौतिक निरीक्षण (Physical Inspection) संपन्न किया।
विधानसभा में इस मुद्दे पर स्थिति साफ करते हुए लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने सदन को आश्वस्त किया कि इन सभी पांचों चिकित्सा महाविद्यालयों में एनएमसी का यह भौतिक निरीक्षण पूरी तरह सकारात्मक रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शुरुआती रुकावटों को सफलतापूर्वक पार कर लिया गया है और अब शैक्षणिक सत्र 2026-27 से इन कॉलेजों को अंतिम मान्यता देने की वैधानिक प्रक्रिया बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी तत्परता की वजह से रद्द होने की कगार पर पहुंचे ये कॉलेज आज छत्तीसगढ़ के छात्रों के लिए 250 नई एमबीबीएस सीटों का रास्ता साफ कर पाए हैं।
इस पूरी जद्दोजहद के बाद मिली कामयाबी का सबसे बड़ा और दूरगामी असर राज्य के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों पर देखने को मिलेगा, जिससे बस्तर और सरगुजा संभाग की पूरी सूरत बदलने वाली है।
लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने वाले गीदम (दंतेवाड़ा) और कुनकुरी (जशपुर) जैसे सुदूर वनांचल क्षेत्रों में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना होना वहां की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अब तक इन इलाकों के मरीजों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर ही अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर काफी ऊंचा उठेगा।
इसके साथ ही, यह ऐतिहासिक कदम स्थानीय नीट (NEET) अभ्यर्थियों और भविष्य के डॉक्टरों के लिए सुनहरे भविष्य के द्वार खोलने वाला है। बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी व ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभावान छात्रों को अब डॉक्टरी की पढ़ाई करने के लिए अपना घर छोड़कर दूर नहीं जाना पड़ेगा। वे अपने ही अंचल में रहकर, कम खर्च पर बेहतर चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल न केवल इन क्षेत्रों में योग्य डॉक्टरों की नई खेप तैयार करेगी, बल्कि स्थानीय युवाओं में उच्च शिक्षा के प्रति एक नया विश्वास और जज्बा पैदा करेगी, जो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास को एक नई गति देगा।

