छत्तीसगढ़: आज जिस छत्तीसगढ़ को हम एक अलग राज्य के रूप में पहचानते हैं, उसके पीछे कई दशकों का संघर्ष, आंदोलन और बलिदान छिपा है। अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की मांग अचानक नहीं उठी थी, बल्कि इसकी शुरुआत आजादी से पहले ही हो गई थी। इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं, साहित्यकारों और जनप्रतिनिधियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग 1920 के दशक से ही उठने लगी थी। समय के साथ यह आवाज मजबूत होती गई। छत्तीसगढ़ की अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा और क्षेत्रीय पहचान को अलग प्रशासनिक पहचान देने की मांग ने आंदोलन का रूप ले लिया।

इस संघर्ष को आगे बढ़ाने में हरि ठाकुर जैसे लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वहीं मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले शंकर गुहा नियोगी ने भी क्षेत्र में सामाजिक चेतना जगाने का काम किया। संत कवि पवन दीवान ने अपनी कविताओं और विचारों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की अस्मिता और अलग राज्य की भावना को आवाज दी।
1990 के दशक में अलग राज्य का आंदोलन और तेज हुआ। इस दौरान चंदूलाल चंद्राकर और विद्याचरण शुक्ल जैसे नेताओं ने अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को राजनीतिक स्तर पर मजबूती से उठाया।
18 मार्च 1994 को मध्य प्रदेश विधानसभा में अलग छत्तीसगढ़ राज्य के गठन से संबंधित प्रस्ताव पारित होना इस आंदोलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। इसके बाद अलग राज्य बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला।

आखिरकार केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ राज्य गठन का विधेयक संसद से पारित हुआ। इसके बाद 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ देश का 26वां राज्य बना।
आज छत्तीसगढ़ अपनी स्थापना के 26 वर्ष पूरे कर चुका है। लेकिन इस राज्य की पहचान के पीछे उन तमाम लोगों का संघर्ष जुड़ा है, जिन्होंने अलग छत्तीसगढ़ का सपना देखा और उसे हकीकत बनाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। ताज़ा खबरों और अपडेट्स के लिए हमें Facebook और Instagram पर फॉलो करें।


