छत्तीसगढ़ में नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता पर संकट: 30 संस्थानों पर लटकी तलवार, 23 अक्टूबर तक अल्टीमेटम
रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में घर-घर शुद्ध पेयजल पहुंचाने का महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ प्रशासनिक खींचतान और भारी भुगतान संकट के भंवर में फंस गया है। सतही जलस्रोतों पर आधारित मल्टी-विलेज योजनाओं के करीब ₹1,100 करोड़ का भुगतान अटकने से निर्माण एजेंसियों ने हाथ खड़े करना शुरू कर दिया है।
आलम यह है कि दर्जनों गांवों में पानी की टंकियां और पाइपलाइन का ढांचा बनकर तैयार खड़ा है, लेकिन राशि के अभाव में टेस्टिंग और नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो पा रही है। यदि गतिरोध जल्द नहीं सुलझा, तो आगामी गर्मियों में 18 जिलों के लाखों ग्रामीणों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
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क्यों अटका भुगतान? O&M नीति पर एक साल से कुंडली
योजना की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ‘संचालन एवं रखरखाव’ (O&M Policy) का न बन पाना है: प्रदेश में जल जीवन मिशन की संचालन एवं रखरखाव नीति का प्रारूप लगभग एक साल से धूल फांक रहा है। केंद्र सरकार से वित्तीय प्रतिपूर्ति (Reimbursement) पाने के लिए इस नीति का अनुमोदित होना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों ने अपनी नीति लागू कर केंद्र से फंड हासिल कर लिया है, लेकिन छत्तीसगढ़ में पंचायत विभाग और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के आपसी समन्वय की कमी से यह अंतिम रूप नहीं ले सकी। वर्ष 2025-26 में राज्य सरकार ने अपने खजाने से भुगतान किया था, लेकिन अब चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में केंद्र से प्रतिपूर्ति मिले बिना अगली किश्त जारी करने में तकनीकी बाधा आ रही है।
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18 जिलों के 3,234 गांवों की प्यास पर असर
गिरते भूजल स्तर से निपटने के लिए राज्य में सतही जल (नदी-जलाशयों) पर आधारित कुल 71 मल्टी-विलेज योजनाएं स्वीकृत की गई थीं।इनमें से अधिकांश प्रोजेक्ट्स में इंटेक वेल, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (WTP), मुख्य पाइपलाइन और ओवरहेड टैंक का निर्माण 80% से अधिक पूरा हो चुका है।इन बड़ी योजनाओं से पानी मिलने के बाद ही इनसे जुड़ी सिंगल-विलेज योजनाओं की टंकियों में पानी भरा जाना है।पहले मई 2026 तक जलापूर्ति शुरू करने की डेडलाइन थी, लेकिन अब यह काम बुरी तरह पिछड़ चुका है।
प्रभावित होने वाले प्रमुख जिले:
सूरजपुर (413 गांव), रायगढ़ (396 गांव), राजनांदगांव (393 गांव), कोरिया (292 गांव), कोरबा (245 गांव), मुंगेली (240 गांव), बेमेतरा (219 गांव), दुर्ग (201 गांव), बलौदाबाजार (192 गांव), सरगुजा (190 गांव), बालोद (148 गांव), बिलासपुर (93 गांव), धमतरी (76 गांव), महासमुंद (48 गांव), जांजगीर-चांपा (32 गांव), कवर्धा (31 गांव), गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (16 गांव) और गरियाबंद (9 गांव)।
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ठेकेदार बोले- कर्ज में डूबी एजेंसियां; प्रशासन का दावा- जल्द निकलेगा हल
“अगस्त 2025 के बाद से निर्माण एजेंसियों को भुगतान नहीं मिला है। 1100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि लंबित होने से ठेकेदारों के सामने काम चालू रखने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। नीति लागू करने के लिए बार-बार शासन से गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन विभागों के तालमेल के अभाव में एजेंसियां, विभाग और ग्रामीण—तीनों पिस रहे हैं।”— बीरेश शुक्ला, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ कांट्रैक्टर एसोसिएशन
“मल्टी-विलेज योजनाओं की नियमित समीक्षा की जा रही है। परियोजनाओं में आ रही तकनीकी कमियों और वित्तीय गतिरोध को दूर करने के प्रयास जारी हैं। निर्माण एजेंसियों को समय-समय पर भुगतान किया जा रहा है और हाल ही में कुछ राशि जारी भी की गई है।”— रिमिजियस एक्का, संचालक, जल जीवन मिशन (छत्तीसगढ़)


