नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो हत्या के आरोपी नाबालिग पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किशोर न्याय कानून (जेजे एक्ट) के तहत हत्या एक ‘जघन्य अपराध’ (Heinous Offence) की श्रेणी में आता है। अदालत ने इसके साथ ही पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें एक 16 वर्षीय किशोर पर वयस्क के रूप में ट्रायल चलाने की अनुमति दी गई थी।
क्या था पूरा मामला?
बिहार में एक लड़के की गला रेतकर हत्या के मामले में आरोपी नाबालिग की उम्र घटना के समय 16 वर्ष थी। शुरुआती चरण में किशोर न्याय बोर्ड (JJ Board) ने मामले का ट्रायल एक नाबालिग के रूप में ही चलाने का फैसला किया था। हालांकि, अपीलीय सत्र न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया और बाद में पटना हाईकोर्ट ने भी किशोर पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के आदेश को सही ठहराया। इसी आदेश के खिलाफ आरोपी नाबालिग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
सजा की तकनीकी परिभाषा पर था मुख्य विवाद
अपील के दौरान नाबालिग के वकील ने दलील दी थी कि जेजे एक्ट के तहत वे अपराध ‘जघन्य’ माने जाते हैं जिनमें कम से कम” सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो। वकील का तर्क था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत मौत या उम्रकैद की सजा तो है, लेकिन इसमें ‘कम से कम’ शब्द का स्पष्ट इस्तेमाल नहीं किया गया है, इसलिए हत्या को ‘गंभीर’ (Serious) अपराध माना जाना चाहिए, न कि ‘जघन्य’।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ की मुख्य टिप्पणियां:
न्यूनतम सजा का दायरा: जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि उम्रकैद, अनिवार्य रूप से, हत्या के लिए न्यूनतम सजा है क्योंकि अदालतें धारा 302 के तहत दोषी पाए जाने पर उम्रकैद से कम सजा नहीं दे सकतीं। इसलिए हत्या को जघन्य अपराध ही माना जाएगा।
हर मामले में मनोवैज्ञानिक की सलाह अनिवार्य नहीं: शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि जेजे एक्ट की धारा 101(2) के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन के खिलाफ अपील सुनने वाली सत्र अदालत के लिए हर मामले में मनोवैज्ञानिकों या चिकित्सा विशेषज्ञों से नई सलाह लेना अनिवार्य नहीं है। अधिनियम में प्रयुक्त ‘सकता है’ शब्द अदालतों को यह विवेकाधिकार देता है कि वे मामले की परिस्थितियों के अनुसार ही विशेषज्ञ सहायता लें।
इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही देश में किशोर न्याय प्रणाली के तहत गंभीर और जघन्य अपराधों के ट्रायल से जुड़े कानूनी प्रावधान और अधिक स्पष्ट हो गए हैं।

