नई दिल्ली। अश्वगंधा के सेवन से लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचने की भ्रांतियों और चिंताओं पर अब तक का सबसे बड़ा वैज्ञानिक विराम लग गया है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मेडिकल जर्नल ‘Frontiers in Medicine’ में प्रकाशित एक बहु-केंद्रित, रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड प्लेसीबो-नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन में यह सिद्ध हुआ है कि 24 सप्ताह (लगभग 6 महीने) तक अश्वगंधा के मूल अर्क (Root Extract) के दैनिक सेवन से लिवर या किडनी की कार्यप्रणाली पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता। यह अध्ययन कोविडशील्ड टीका लगवा चुके 1,200 स्वस्थ वयस्कों पर 7 प्रमुख केंद्रों में किया गया।
9 प्रमुख संस्थानों के 45 वैज्ञानिकों का संयुक्त अध्ययन
यह उच्च स्तरीय अनुसंधान केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय और आयुष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस सहित देश के 9 प्रतिष्ठित संस्थानों के 45 शोधकर्ताओं की बहु-विषयक टीम द्वारा पूरा किया गया। इस ट्रायल को ‘क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री–इंडिया’ (CTRI) में पंजीकृत किया गया था।
अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक निष्कर्ष
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लिवर और किडनी पूरी तरह सुरक्षित:24 सप्ताह तक प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क (जो 4 ग्राम कच्ची जड़ के चूर्ण के बराबर है) लेने वाले प्रतिभागियों के लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया के स्तर पूरी तरह सामान्य और संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे। दवा के कारण किसी भी अंग को नुकसान का कोई प्रमाण नहीं मिला।
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वैक्सीन के प्रभाव पर नहीं पड़ा कोई नकारात्मक असर:परीक्षण में पाया गया कि अश्वगंधा ने कोविडशील्ड वैक्सीन से विकसित हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) में कोई बाधा नहीं डाली। अश्वगंधा लेने वाले और प्लेसीबो लेने वाले दोनों ही समूहों में वायरस को निष्क्रिय करने वाली गतिविधि (Neutralizing Activity) 85% से अधिक उच्च स्तर पर बनी रही।
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उत्कृष्ट सहनशीलता और सुरक्षा प्रोफाइल:18 से 70 वर्ष आयु वर्ग के 1,200 प्रतिभागियों में से 86% (1,032 लोगों) ने अध्ययन को सफलतापूर्वक पूरा किया। किसी भी प्रतिभागी में इसके सेवन से गंभीर साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिले और न ही किसी ने प्रतिकूल प्रभाव के चलते ट्रायल छोड़ा।
विशेषज्ञों और आयुष मंत्रालय की प्रतिक्रिया
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वैद्य राजेश कोटेचा (सचिव, आयुष मंत्रालय):उन्होंने कहा कि यह अध्ययन मानकीकृत आयुर्वेदिक उपचारों की सुरक्षा और उपयोगिता का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करता है। कठोर और आधुनिक क्लिनिकल ट्रायल्स से आयुर्वेद के वैश्विक स्तर पर साक्ष्य-आधारित (Evidence-based) उपयोग को बड़ा बल मिलेगा।
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डॉ. अरविंद चोपड़ा (प्रमुख लेखक एवं मुख्य रूमेटोलॉजिस्ट):पुणे स्थित ‘सेंटर फॉर रूमेटिक डिजीज’ के निदेशक डॉ. चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि 24 सप्ताह का यह बड़ा ट्रायल साबित करता है कि मानकीकृत अश्वगंधा पूरी तरह सुरक्षित और सहनशील है। यह शोध पारंपरिक दवाओं के आधुनिक वैज्ञानिक मूल्यांकन का एक आदर्श मॉडल है।
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प्रो. भूषण पाटवर्धन व प्रो. रबिनारायण आचार्य:विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि पारंपरिक ज्ञान को जब आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखा जाता है, तो उससे वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में आयुर्वेद का दायरा और साख दोनों मजबूत होते हैं। यह शोध आयुर्वेदिक उत्पादों के जिम्मेदार और सुरक्षित उपयोग के लिए मील का पत्थर साबित होगा।























