देशभर में स्लीपर बसों में आग लगने के हादसों में पूर्व में 100 से अधिक लोगों की जान जाने के बाद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने कड़े कदम उठाते हुए 1 सितंबर से ‘नया बस बॉडी कोड’ लागू किया था। इसे सुरक्षा का अंतरराष्ट्रीय मानक करार दिया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। देश में एक ही दिन के भीतर बसों में आग लगने की तीन अलग-अलग बड़ी घटनाएं सामने आने से सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी की पोल खुल गई है। ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर एक स्लीपर बस के आग का गोला बन जाने से 9 यात्रियों की जिंदा जलकर दर्दनाक मौत हो गई, जबकि मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे और हैदराबाद से श्रीशैलम जा रही दो अन्य चलती बसों में भी भीषण आग लग गई, जिनमें गनीमत रही कि कोई हताहत नहीं हुआ।
हादसों की पड़ताल में बस ऑपरेटरों की घोर लापरवाही और नियमों के खुले उल्लंघन की बात सामने आ रही है। यमुना एक्सप्रेसवे पर जली बस की छत पर भारी मात्रा में व्यावसायिक सामान लदा हुआ था, जो तय नियमों के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है। दिल्ली से उत्तर प्रदेश और हरियाणा होते हुए लंबी दूरी तय करने वाली दर्जनों स्लीपर बसें धड़ल्ले से ओवरलोड सामान ढो रही हैं। इसके बावजूद रास्ते में न तो राज्य परिवहन विभाग के उड़नदस्ते और न ही ट्रैफिक पुलिस इन वाहनों को रोककर कार्रवाई करने की जहमत उठाते हैं। फिटनेस प्रमाणपत्र जारी होने के बाद बसों की असल स्थिति क्या है, इसकी नियमित मॉनिटरिंग का कोई पुख्ता तंत्र मौजूद नहीं है।
मामले में तकनीकी विशेषज्ञों ने बीएस-6 (BS-VI) तकनीक और परिवहन विभाग की जांच क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हाल के दिनों में बीएस-6 श्रेणी की बसों में शॉर्ट सर्किट और आग लगने की घटनाओं में इजाफा देखा गया है। अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स और जटिल वायरिंग सिस्टम से लैस इन गाड़ियों में इलेक्ट्रिकल फेलियर की आशंका अधिक रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क पर चेकिंग करने वाले परिवहन इंस्पेक्टरों और आरटीओ अमले के पास इन आधुनिक बसों के इलेक्ट्रिकल सिस्टम और वायरिंग का तकनीकी ऑडिट करने की न तो विशेषज्ञता है और न ही जरूरी उपकरण। वायरिंग जलने और शॉर्ट सर्किट होने के चंद मिनटों में पूरी बस आग के गोले में तब्दील हो जाती है, जिससे यात्रियों को संकरे आपातकालीन दरवाजों से निकलने तक का मौका नहीं मिलता।
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल कागजों पर नए नियम या अंतरराष्ट्रीय कोड बना देने से हादसों पर लगाम नहीं लगेगी। जब तक आरटीओ कार्यालयों द्वारा जारी किए जाने वाले फिटनेस टेस्ट की विश्वसनीयता सुनिश्चित नहीं होगी और सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ती ओवरलोड, अवैध स्लीपर बसों पर परिवहन विभाग का नियमित और कड़ा शिकंजा नहीं कसेगा, तब तक मुसाफिरों की जान इसी तरह जोखिम में बनी रहेगी।
देश में स्लीपर और लंबी दूरी की यात्री बसों में भीषण आग लगने के प्रमुख पुराने दर्दनाक हादसे:
1. समृद्धि एक्सप्रेसवे हादसा, बुलढाणा (महाराष्ट्र – 2023)
नागपुर से पुणे जा रही एक निजी स्लीपर बस आधी रात को डिवाइडर और पोल से टकराकर पलट गई।टक्कर के तुरंत बाद डीजल टैंक फटने और शॉर्ट सर्किट से भीषण आग लग गई। बस का एकमात्र मुख्य दरवाजा जमीन की तरफ दब जाने के कारण 25 यात्रियों की जिंदा जलकर मौत हो गई थी। केवल 8 लोग शीशा तोड़कर बाहर निकल पाए थे।
2. नासिक स्लीपर बस अग्निकांड (महाराष्ट्र – 2022)
यवतमाल से मुंबई जा रही एक निजी ट्रेवल्स की स्लीपर बस की टक्कर एक ट्रक (ट्रेलर) से हो गई। टक्कर होते ही बस में तेज धमाके के साथ आग लग गई। इस हादसे में 12 यात्रियों की जलने से दर्दनाक मौत हुई थी और 40 से अधिक लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे।
3. कन्नौज बस-ट्रक भिड़ंत (उत्तर प्रदेश – 2020)
फर्रुखाबाद से जयपुर जा रही डबल डेकर स्लीपर बस जीटी रोड पर सामने से आ रहे ट्रक से टकरा गई। टक्कर के चंद पलों में ही बस आग का गोला बन गई। बस में करीब 45 यात्री सवार थे, जिनमें से लगभग 20 लोगों की मौके पर ही जलकर मौत हो गई थी।
4. जालोर बस बिजली तार हादसा (राजस्थान – 2020)
एक ट्रेवलर बस रास्ता भटक कर ग्रामीण इलाके में चली गई, जहां ऊपर से गुजर रही 11 केवी की हाईटेंशन लाइन बस की छत से छू गई। करंट फैलते ही बस में भीषण आग लग गई, जिससे 6 यात्रियों की जिंदा जलने से मौत हो गई और कई लोग झुलस गए थे।
5. महबूबनगर वोल्वो बस अग्निकांड (आंध्र प्रदेश/तेलंगाना – 2013)
बैंगलोर से हैदराबाद जा रही जब्बार ट्रेवल्स की लग्जरी वोल्वो बस तड़के राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलिया से टकरा गई।
फ्यूल टैंक फटने के बाद आग इतनी तेजी से फैली कि सो रहे यात्रियों को संभलने का मौका नहीं मिला। इस दर्दनाक हादसे में 45 यात्रियों की जलकर मौत हो गई थी। इस घटना के बाद देश भर में इमरजेंसी एग्जिट के नियमों को लेकर बड़ी बहस छिड़ी थी।
हादसों में सामने आए समान कारण:
-
बस का मुख्य दरवाजा लॉक हो जाना या जाम होना।
-
इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन खिड़की/गेट) का काम न करना या उस तक पहुंचने का रास्ता संकरा होना।
-
इंटीरियर में अत्यधिक ज्वलनशील फोम, पर्दे और प्लास्टिक का उपयोग, जिससे जहरीला धुआं और आग तेजी से फैलती है।
-
छतों और डिक्की में ज्वलनशील व अवैध सामान की लोडिंग।























