पटना:
दीपावली की रात धन-वैभव की देवी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश के विधि-विधान से पूजन के बाद अगली सुबह बिहार और मिथिलांचल के ग्रामीण व कस्बाई इलाकों में एक अत्यंत प्राचीन और लोकआस्था से जुड़ी परंपरा निभाई जाती है। इसे स्थानीय बोलचाल में ‘दरिद्र खेदना’ (दरिद्रता को भगाना) कहा जाता है। इस पारंपरिक रस्म के तहत घर की महिलाएं ब्रह्ममुहूर्त में सूर्योदय से पहले उठकर पुराने सूप को छड़ी या टूटे झाड़ू से पीटते हुए घर से नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता को बाहर निकालने की सदियों पुरानी परंपरा पूरी करती हैं।
यह अनुष्ठान सूर्योदय से लगभग एक घंटा पहले, अंधेरे में ही शुरू हो जाता है। घर की महिलाएं घर में इस्तेमाल हो चुके पुराने बांस के सूप और झाड़ू को लेकर हर कमरे, दालान और कोने-कोने में जाती हैं। वे सूप पर डंडे या झाड़ू से थाप देते हुए पारंपरिक लोक पंक्ति—‘अन्न-धन लक्ष्मी घर आए, दरिद्रता बाहर जाए’—का उच्चारण करती हैं। इसके बाद महिलाएं सूप और झाड़ू को लेकर घर के मुख्य द्वार से बाहर निकलती हैं। कई इलाकों में मान्यता के अनुसार इन्हें दक्षिण दिशा की ओर ले जाकर गांव या बस्ती की सीमा से दूर खेतों या झाड़ियों में छोड़ दिया जाता है, जिससे घर की तमाम विपत्तियां और आर्थिक तंगी हमेशा के लिए दूर चली जाएं।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय जनजीवन में सूप को केवल एक घरेलू वस्तु नहीं, बल्कि अन्न, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। जिस तरह सूप अनाज से भूसी, कंकड़ और अशुद्धियों को फटक कर अलग कर देता है और केवल शुद्ध अन्न को शेष रखता है, उसी प्रतीकात्मक भाव के तहत सूप की थाप को घर से आलस्य, दरिद्रता और अभाव को दूर करने का माध्यम माना जाता है। लोकमान्यता है कि जब तक घर से नकारात्मकता का निष्कासन नहीं होता, तब तक मां लक्ष्मी का स्थायी वास संभव नहीं है।
पूर्वजों के दौर से चली आ रही इस रस्म को आज की पीढ़ी भी पूरी श्रद्धा और आत्मीयता से निभा रही है। स्थानीय महिलाओं का कहना है कि यह केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि परिवार की सुख-शांति, सकारात्मक ऊर्जा और संतुष्टि से जुड़ा विश्वास है। दिवाली के उल्लास के बाद घर की पूरी तरह शुद्धि कर नववर्ष और आने वाले महापर्व छठ के स्वागत की तैयारी के रूप में भी इस अनुष्ठान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।


