जशपुर:
जहां देश भर के शहरों और कस्बों में कार्तिक अमावस्या पर दीपावली की जगमगाहट, आतिशबाजी और मां लक्ष्मी-गणेश की पूजा की धूम रहती है, वहीं झारखंड, छत्तीसगढ़ और सीमावर्ती आदिवासी बाहुल्य ग्रामीण अंचलों में दीपावली का पारंपरिक स्वरूप बिल्कुल अलग नजर आता है। इन गांवों में सदियों से दीपावली के स्थान पर आदिवासियों और मूलवासियों का सबसे बड़ा लोकपर्व ‘सोहराय’ मनाया जाता है। ग्रामीण इलाकों में इस दिन भौतिक चमक-दमक या पटाखों के शोर के बजाय प्रकृति, नई फसल और साल भर खेती में साथ निभाने वाले मवेशियों (गाय-बैलों) के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने की अनूठी परंपरा जीवित है।
ग्रामीणों के अनुसार, सोहराय का मुख्य आधार पशुधन और धरती माता के प्रति आभार जताना है। ग्रामीण परिवेश में बैल और गाय केवल श्रम का साधन नहीं, बल्कि परिवार के अभिन्न सदस्य माने जाते हैं। पर्व के दौरान ग्रामीण अपने घरों के साथ-साथ मवेशियों के रहने के स्थान यानी गोहाल की विशेष सफाई करते हैं। पशुओं को सुबह स्थानीय नदियों और तालाबों में ले जाकर नहलाया जाता है। इसके बाद उनके शरीर पर कुजरी तेल और सींगों पर हल्दी व सिंदूर लगाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘तेल मखाई’ कहा जाता है। मवेशियों के सींगों और गलों को धान की नई बालियों और मालाओं से सजाया जाता है। अमावस्या की रात गोहाल में चारों दिशाओं की सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में चौमुखी मिट्टी का दीया जलाया जाता है।
सोहराय के अवसर पर गांवों की मिट्टी की दीवारों पर दिखने वाली सोहराय चित्रकला इस पर्व की सबसे विशिष्ट पहचान है। गांव की महिलाएं लाल, काली, पीली और सफेद प्राकृतिक मिट्टी से घरों की कच्ची दीवारों पर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और प्राकृतिक जीवन के अद्भुत भित्तिचित्र उकेरती हैं। इतिहासकारों के अनुसार, गुफाओं से शुरू हुई यह कला परंपरा लगभग 10,000 वर्ष पुरानी है, जिसे भारत सरकार द्वारा जीआई (GI) टैग भी मिल चुका है। त्योहार के दिन मवेशियों और परिवार के लिए मक्का, उड़द, अरहर, धान और अन्य अनाजों को मिलाकर ‘कुहड़ी’ नामक विशेष पौष्टिक आहार तैयार किया जाता है, जो साझे जीवन और सामूहिक सौहार्द का संदेश देता है।


गांवों में यह पर्व केवल एक दिन का नहीं, बल्कि पांच दिनों तक पूरे विधि-विधान से चलता है। इसमें गाय-बैलों के साथ ‘खूंटव’ खेल, मांदर-नगाड़े की थाप पर ‘चांचर’ लोकगीतों का गायन और सामूहिक भोज जैसी कई लोक परंपराएं निभाई जाती हैं। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का भी प्रतीक है, जहां भाई अपनी विवाहित बहनों को ससम्मान मायके बुलाकर पर्व में शामिल करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्वजों के समय से चली आ रही यह परंपरा सिखाती है कि जिन पशुओं और खेतों की बदौलत मनुष्य का जीवन चलता है, सबसे पहले उनकी पूजा और सेवा करना ही सच्चा धर्म है।




