रांची:
खेतों में पकती नई फसल की सोंधी खुशबू और हल्की गुलाबी ठंड के बीच झारखंड सहित पूरे पूर्वी भारत में आदिवासी समाज का सबसे बड़ा लोकपर्व ‘सोहराय’ पूरे पारंपरिक उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। मनुष्य और पशुधन के बीच आत्मीय व अटूट रिश्ते का प्रतीक यह उत्सव न केवल झारखंड, बल्कि पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, असम और त्रिपुरा के आदिवासी और मूलवासी सदान समाजों में भी धूमधाम से आयोजित होता है। संताल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, भूमिज सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों के लिए यह पर्व केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन भर खेती में कंधा से कंधा मिलाकर साथ निभाने वाले मवेशियों के प्रति कृतज्ञता और आभार प्रकट करने का एक अनूठा माध्यम है।
सोहराय का शाब्दिक और सांस्कृतिक संबंध पशुओं को ‘सराहने’ और ‘दुलारने’ से है। यह पर्व अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में मुख्य रूप से दो समय पर मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा झारखंड के कोल्हान व उत्तरी छोटानागपुर के कुछ हिस्सों में यह कार्तिक माह की अमावस्या (दीपावली के समय) पर आयोजित होता है, जिसे फसल कटाई के आरंभ का समय माना जाता है। वहीं, संताल परगना, असम, बिहार और छोटानागपुर के अन्य हिस्सों में जब धान की पूरी कटाई संपन्न हो जाती है और अनाज खलिहानों से घर पहुंचता है, तब इसे पौष माह यानी जनवरी में मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, 1855 के ऐतिहासिक हूल विद्रोह के बाद हुए सामाजिक स्थानांतरण और विस्थापन के कारण इस पर्व की तिथियों में यह क्षेत्रीय भिन्नता देखने को मिलती है। इसे अलग-अलग क्षेत्रों में गोहाल पूजा, डांगर पूजा, बांदना परब और भैंसासुर पूजा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
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इस पर्व का एक प्रमुख वैश्विक आकर्षण ‘सोहराय चित्रकला’ है, जो जनजातीय महिलाओं के श्रम, सौंदर्यबोध और सृजन का अद्भुत संगम है। पर्व से पूर्व महिलाएं अपने कच्चे घरों को मिट्टी और गोबर से लीपकर सफेद चूने से पोतती हैं। इसके बाद स्थानीय स्तर पर मिलने वाली विभिन्न रंगों की प्राकृतिक मिट्टी, चारकोल और पत्तों के रंगों से दीवारों पर विशाल भित्तिचित्र (म्यूरल्स) उकेरे जाते हैं। इन चित्रों में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जलचर और दैनिक जीवन के दृश्य अत्यंत कलात्मक ढंग से दर्शाए जाते हैं। हजारीबाग की ऐतिहासिक ‘इसको’ गुफाओं में मिले प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से प्रमाणित होता है कि यह कला परंपरा 5,000 से 10,000 वर्ष पुरानी है। हजारीबाग, गिरिडीह, दुमका और बोकारो में प्रमुखता से विकसित इस कला की ‘मंझू सोहराय’ और ‘कुड़मी सोहराय’ दो मुख्य शैलियां हैं। वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा इसे भौगोलिक उपदर्शन (GI टैग) प्रदान किए जाने के बाद आज यह कला मिट्टी की दीवारों से निकलकर कपड़ों, हस्तशिल्प और आधुनिक डिजाइनों तक अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है।
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पारंपरिक संताल और अन्य आदिवासी परंपराओं में सोहराय का मुख्य उत्सव पांच दिनों तक विशिष्ट रीति-रिवाजों के साथ चलता है। पहले दिन को ‘उम नड़का’ कहा जाता है, जिसमें घरों, गोहालों और हल-जुआठ जैसे कृषि उपकरणों की साफ-सफाई की जाती है। इस दिन पशुओं को नहलाकर कुजरी के औषधीय तेल से उनकी मालिश की जाती है और सींगों पर तेल व सिंदूर (तेल मखाई) लगाया जाता है। रात में चारों दिशाओं की समृद्धि के प्रतीक के रूप में गोहाल में चौमुखी दीया जलाया जाता है और कुलदेवताओं जैसे मरांग बुरु व जाहेर एरा का आह्वान किया जाता है। दूसरा दिन ‘दाकाय’ कहलाता है, जिसमें आंगन से गोहाल तक चावल के घोल से अल्पना सजाई जाती है। गांव के पाहन द्वारा पूजा-अर्चना के बाद पशुओं को गेहूं, मक्का, बाजरा, अरहर, उड़द, कुरथी और धान जैसे सात अन्नों को उबालकर तैयार किया गया विशेष पौष्टिक आहार ‘कुहड़ी’ खिलाया जाता है, जिसे परिवार के लोग भी प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।
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उत्सव के तीसरे दिन को ‘खूंटव’ या ‘सण्टाऊ’ कहा जाता है, जो असीम उत्साह और शौर्य का दिन होता है। गांव के अखरा में ऊंचा खूंटा गाड़कर उसके शीर्ष पर चावल और गुड़ से बनी मीठी रोटी (गुड़ पीठा) बांधी जाती है और नीचे मजबूत बैल को बांधा जाता है। ढोल-मांदर की गूंज के बीच ग्रामीण युवक बैल के वार से बचते हुए उस पीठे को हासिल करने की वीरतापूर्ण प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं। चौथे दिन ‘जाले पूजा’ के तहत गांव के युवक-युवतियां मांदर और नगाड़ों की थाप पर ‘चांचर’ और ‘हराबदिया’ गीत गाते हुए घर-घर जाकर नृत्य करते हैं, जहां गृहस्वामी उन्हें पकवान और पारंपरिक पेय भेंट करते हैं। पांचवें और अंतिम दिन ‘हाको काटकोम’ मनाया जाता है, जिसमें ग्रामीण सामूहिक रूप से नदियों-तालाबों से मछलियों और केकड़ों का शिकार करते हैं। शाम को एक साथ बैठकर सामूहिक खिचड़ी भोज होता है और देर रात तक लोकनृत्यों का दौर चलता है।
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सामाजिक समरसता के स्तर पर सोहराय भाई-बहन के प्रेम और पारिवारिक पुनर्मिलन का भी सशक्त माध्यम है। परंपरा के अनुसार, इस पर्व पर भाई अपनी विवाहित बहन के घर जाकर उसे मायके आने का विशेष न्योता देता है। यदि किसी कारणवश भाई निमंत्रण न भेजे, तो इसे सामाजिक रूप से अनुचित माना जाता है। इसके पीछे प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, जब एक किसान ने अपने सहयोगी बैल-गायों को उपेक्षित किया था, तब सर्वोच्च देव मरांग बुरु ने उसे चेताया था कि पशुधन के सम्मान और उनके साथ उपज साझा किए बिना मानव जीवन अधूरा है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज के आधुनिक युग में भी पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और बेजुबान पशुओं के साथ मानवीय संवेदना का सर्वश्रेष्ठ संदेश देती है।


