पटना/
चार दिवसीय आस्था के महापर्व छठ का दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण ‘खरना’ शनिवार, 14 नवंबर 2026 को पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जाएगा। नहाय-खाय से शुरू होने वाले इस अनुष्ठान में खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को भगवान भास्कर व छठी मैया की विधिवत पूजा के उपरांत गुड़ की खीर और रोटी का नैवेद्य अर्पित करते हैं। खरना का प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही व्रतियों का लगभग 36 घंटे का अखंड निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है, जिसका समापन 16 नवंबर को उगते सूर्य को उषा अर्घ्य देने के बाद पारण के साथ होगा।
छठ पर्व में खरना के प्रसाद का विशेष आध्यात्मिक और पारंपरिक महत्व है। इस दिन मुख्य रूप से दूध, अरवा चावल और शुद्ध गुड़ से खीर तैयार की जाती है, जिसे बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘रसियाव’ कहा जाता है। इसके साथ ही गेहूं के आटे की सादी रोटियां और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। पारंपरिक रूप से चीनी की जगह गुड़ का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि गुड़ को प्राकृतिक, शुद्ध और अप्रसंस्कृत माना जाता है, जो सदियों से चली आ रही लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार कुछ जगहों पर चीनी की खीर बनाने का भी रिवाज है, लेकिन गुड़ की खीर को ही मूल रूप से प्राथमिकता दी जाती है।
खरना का प्रसाद तैयार करने के लिए पवित्रता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। परंपरा के अनुसार, प्रसाद पकाने के लिए गंगाजल से पवित्र की गई मिट्टी से नया चूल्हा बनाया जाता है और ईंधन के रूप में आम की पवित्र लकड़ी का इस्तेमाल होता है। शहरी परिवेश और बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए यदि मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी की व्यवस्था संभव न हो, तो वे पूरी तरह साफ किए गए नए या शुद्ध गैस चूल्हे पर भी प्रसाद बना सकते हैं। शास्त्रों और लोक परंपराओं में स्पष्ट है कि साधनों से अधिक मन की पवित्रता और स्वच्छता सर्वोपरि होती है।
खरना के दिन व्रती सुबह स्नान कर स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र धारण करते हैं। महिलाएं लाल, पीली या अन्य मांगलिक रंगों की शुद्ध सूती या रेशमी साड़ियां पहनती हैं, जबकि पुरुष स्वच्छ धोती-कुर्ता पहनते हैं। दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को जब वातावरण शांत होता है, तब एकांत में छठी मैया और सूर्य देव की पूजा की जाती है। केले के पत्ते पर खीर, रोटी और फल अर्पित कर ध्यान लगाया जाता है। पूजा के तुरंत बाद व्रती उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं और उनके भोजन समाप्त करने के बाद ही यह पावन प्रसाद परिवार के सदस्यों और पास-पड़ोस के लोगों में श्रद्धापूर्वक वितरित किया जाता है। इसके बाद से ही 36 घंटे के निर्जला साधना काल का आरंभ हो जाता है।



