नई दिल्ली:
दिवाली महापर्व की शुरुआत का प्रतीक माना जाने वाला धनतेरस का त्योहार धार्मिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पावन अवसर पर धन की देवी मां लक्ष्मी और धनाध्यक्ष कुबेर देव के साथ आयुर्वेद व चिकित्सा के जनक भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा है। साल 2026 में धनतेरस का यह पावन पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि यानी शुक्रवार, 6 नवंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, धनतेरस केवल सोना-चांदी या बर्तन खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व जीवन में भौतिक समृद्धि के साथ-साथ ‘पहला सुख निरोगी काया’ के महत्व को भी स्थापित करता है।
पौराणिक संदर्भों के अनुसार, भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का संबंध ऐतिहासिक समुद्र मंथन की घटना से जुड़ा हुआ है। अमृत प्राप्ति के उद्देश्य से जब देवताओं और असुरों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथनी, भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को आधार और वासुकी नाग को नेती (रस्सी) बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया, तब उस महामंथन से उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी और मां लक्ष्मी सहित चौदह दिव्य रत्न निकले। इसी मंथन के अंतिम चरण में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत से परिपूर्ण स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार और चिकित्सा विज्ञान व आयुर्वेद का आदि प्रवर्तक माना जाता है। उनके इसी प्राकट्य दिवस के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष धनतेरस का महापर्व मनाया जाता है।
धार्मिक व सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भगवान धन्वंतरि को आरोग्य, निरोगी जीवन और दीर्घायु का अधिष्ठाता देव माना गया है। समाज को यह संदेश देने के लिए कि बिना उत्तम स्वास्थ्य के धन और वैभव व्यर्थ है, इस दिन श्रद्धालु अपने घरों में यमदीप प्रज्वलित करने के साथ भगवान धन्वंतरि की विधिवत उपासना करते हैं। पूजा विधान के अनुसार, प्रातःकाल स्नान के उपरांत पूजा स्थल की शुद्धि कर भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। इसके पश्चात उन्हें गंध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य और पारंपरिक पूजा सामग्री अर्पित कर आरोग्य मंत्रों का जाप किया जाता है और परिवार के सभी सदस्यों के लिए रोगमुक्त जीवन व दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है।


