पटना
लोक आस्था और शुचिता का महापर्व छठ चार दिनों तक अत्यंत कठिन नियमों, उपवास और पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और संतानों की रक्षा करने वाली छठी मैया की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। प्रकृति और मानव जीवन के परस्पर गहरे संबंध को दर्शाने वाले इस पर्व की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें न केवल उदीयमान (उगते हुए) सूर्य को, बल्कि अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य को भी श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित किया जाता है। हिंदू धर्म और लोक परंपराओं में भगवान भास्कर और छठी मैया की इस संयुक्त आराधना को लेकर गहरा धार्मिक और पौराणिक महत्व निहित है।
पौराणिक संदर्भों और मान्यताओं के अनुसार, छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री ‘देवसेना’ माना जाता है, जिन्हें प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण ‘षष्ठी देवी’ भी कहा जाता है। लोक आस्था में यही षष्ठी देवी ‘छठी मैया’ के नाम से पूजनीय हैं। इन्हें बालकों की रक्षा करने वाली, उत्तम स्वास्थ्य देने वाली और दीर्घायु प्रदान करने वाली देवी माना गया है। वहीं, भगवान सूर्य संपूर्ण जगत में ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का साक्षात आधार हैं। धार्मिक दृष्टि से भगवान सूर्य आरोग्य और ऊर्जा के दाता हैं, जबकि छठी मैया परिवार में संतान सुख और उसकी कुशलता सुनिश्चित करती हैं। यही कारण है कि छठ पूजा के दौरान व्रती महिलाएं और पुरुष दोनों शक्तियों की आराधना कर परिवार के आरोग्य और संतानों के कल्याण की मंगल कामना करते हैं।
षष्ठी देवी की पूजा के प्राकट्य से जुड़ी कथा राजा प्रियव्रत और उनकी रानी मालिनी से संबंधित है। कथा के अनुसार, दीर्घकाल तक संतानहीन रहने के बाद राजा ने महर्षि कश्यप के निर्देश पर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ के फल से रानी गर्भवती हुईं, परंतु उनका नवजात शिशु मृत उत्पन्न हुआ। इस असहनीय वियोग से आहत होकर जब राजा अपने प्राण त्यागने लगे, तभी आकाश से एक दिव्य विमान में माता देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने स्वयं को सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से जन्मी षष्ठी देवी बताते हुए राजा से अपनी आराधना करने और प्रजा में भी इसका प्रसार करने को कहा। राजा ने देवी के कथनानुसार पूर्ण निष्ठा से पूजन किया, जिसके प्रभाव से उनका मृत पुत्र पुनः जीवित हो उठा। तभी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर संतान की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए इस व्रत को करने की परंपरा प्रारंभ हुई।
छठ पर्व का एक सबसे वैज्ञानिक और दार्शनिक पहलू सूर्य देव को अर्घ्य देना है। शाम के समय अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर भक्त जीवन भर मिलने वाली ऊर्जा और पोषण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, वहीं भोर में उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर जीवन में नई आशा, सकारात्मकता और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मांगा जाता है। यह विधान समाज को यह शाश्वत संदेश भी देता है कि जो ढलता है, उसका उदय भी निश्चित है, और सम्मान ढलते व उगते दोनों स्वरूपों का समान रूप से किया जाना चाहिए।


