सर्व शिक्षक संघ की मेहनत रंग लाई: पीटीआई के 2435 पदों पर बड़ा फैसला, 50% सीधी भर्ती और 50% पदोन्नति
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफ केयर हॉस्पिटल में सामने आए लगभग 15 वर्ष पुराने अवैध गर्भपात मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा तीनों आरोपी चिकित्सकों को बरी किए जाने के आदेश को आंशिक रूप से पलटते हुए उन्हें मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत दोषी करार दिया है। यह मामला वर्ष 2011 में अस्पताल परिसर में विभिन्न बोतलों में रखे 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण और गर्भपात से जुड़े उपकरणों की बरामदगी से जुड़ा हुआ है।
यह सनसनीखेज मामला 7 अगस्त 2011 का है, जब कोरबा के तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और कटघोरा एसडीएम के संयुक्त प्रशासनिक दल ने दीपका स्थित लाइफ केयर अस्पताल पर औचक छापा मारा था। तलाशी के दौरान अस्पताल से अलग-अलग कांच की बोतलों में संरक्षित 16 से 32 सप्ताह के मानव भ्रूण, बड़ी संख्या में एक्सपायर्ड दवाइयां और अवैध गर्भपात कराने में प्रयुक्त होने वाले चिकित्सीय उपकरण बरामद किए गए थे। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की शिकायत पर संबंधित चिकित्सकों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
शुरुआती दौर में इस प्रकरण की सुनवाई कटघोरा के अपर सत्र न्यायालय में हुई थी, जहां साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए अदालत ने आरोपी डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और रेणू श्रीवास्तव को बरी कर दिया था। निचली अदालत के इस निर्णय के खिलाफ राज्य शासन ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर कर न्याय की गुहार लगाई थी।
हाईकोर्ट ने राज्य शासन की अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपनी सख्त टिप्पणी में स्पष्ट किया कि आरोपी चिकित्सक यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूण किसी वैध चिकित्सीय आवश्यकता अथवा सद्भावनापूर्वक (Good Faith) संरक्षित किए गए थे। अदालत ने माना कि परिस्थितियों और बरामदगी से एमटीपी एक्ट के प्रावधानों का खुला उल्लंघन सिद्ध होता है। करीब डेढ़ दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आए हाईकोर्ट के इस फैसले ने अवैध गर्भपात के मामलों में कठोर कानूनी नजीर पेश की है।























