नई दिल्ली:
अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक, सनातन परंपरा का सबसे बड़ा महापर्व दीपावली आज, रविवार 8 नवंबर को देशभर में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या आगमन की स्मृति में दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। इस पावन अवसर पर धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी, प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश और धन के कोषाध्यक्ष कुबेर देवता के विधिवत पूजन का विधान है।
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लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त और पंचांग गणना
द्रिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक अमावस्या तिथि 8 नवंबर रविवार को सुबह 11:29 बजे से प्रारंभ हो चुकी है, जो 9 नवंबर सोमवार को सुबह 11:27 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल में अमावस्या तिथि की व्याप्ति आज 8 नवंबर को ही मिल रही है (9 नवंबर के प्रदोष काल में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा लग जाएगी), इसलिए आज ही दीपावली पूजन किया जा रहा है। वहीं 9 नवंबर को स्नान-दान की सोमवती अमावस्या रहेगी।
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लक्ष्मी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: शाम 05:54 बजे से रात 07:50 बजे तक (अवधि: 1 घंटा 56 मिनट)
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प्रदोष काल: शाम 05:31 बजे से रात 08:09 बजे तक
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वृषभ लग्न (स्थिर लग्न): शाम 05:54 बजे से रात 07:50 बजे तक
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निशिता काल (तांत्रिक व काली पूजा मुहूर्त): रात 11:39 बजे से देर रात 12:31 बजे तक
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सिंह लग्न: रात 12:25 बजे से 02:42 बजे तक
दीपावली नहीं, सोहराय मनाते हैं यहां के ग्रामीण: प्रकृति और मवेशियों की पूजा कर जताते हैं आभार, 10 हजार साल पुरानी परंपरा आज भी कायमशास्त्र मान्यता: गृहस्थों और व्यापारियों के लिए प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ काल) में लक्ष्मी पूजन सबसे उत्तम और स्थायी फलदायी माना जाता है, जिससे घर में मां लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
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पूजन के प्रमुख नियम और वास्तु सम्मत उपाय
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शुभ दिशा का चयन: उत्तर दिशा को कुबेर और धन की दिशा माना गया है। पूजन उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा में करें, और पूजा करते समय जातक का मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।
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नई मूर्तियां व लाल रंग का प्रयोग: हर वर्ष दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश की नई मृण्मयी (मिट्टी की) मूर्तियां स्थापित करनी चाहिए (चांदी की प्रतिमाओं को गंगाजल से शुद्ध कर पुन: पूज सकते हैं)। मां लक्ष्मी को प्रिय लाल वस्त्र, लाल पुष्प और लाल श्रृंगार अर्पित करें।
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तोरण व स्वस्तिक स्थापना: मुख्य द्वार पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों से बना तोरण लगाएं। पूजा स्थल पर रोली/सिंदूर से दोनों तरफ स्वस्तिक चिह्न बनाएं।
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शंखनाद व मिट्टी के दीप: पूजन के समय शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। घर में पंचतत्वों के संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए गाय के घी व तिल के तेल से मिट्टी के दीपक जलाएं।
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वैश्विक फलक पर दिवाली: नेपाल से न्यूयॉर्क तक दीपोत्सव
दिवाली की जगमगाहट केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई देशों में यह महापर्व अपनी अनूठी सांस्कृतिक छटा बिखेर रहा है:
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नेपाल (तिहार): यहां 5 दिनों का दीपोत्सव चलता है, जिसमें प्रकृति व जीवों की पूजा होती है—पहले दिन काग तिहार (कौआ), दूसरे दिन कुकुर तिहार (कुत्ता), तीसरे दिन गो-पूजा व लक्ष्मी पूजन, चौथे दिन गोवर्धन/म्हा पूजा और पांचवें दिन ‘भाई टीका’।
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श्रीलंका व मलेशिया: तमिल हिंदू समुदाय द्वारा पारंपरिक तेल-स्नान, मंदिरों में दर्शन और चावल के आटे से रंग-बिरंगी ‘कोलम’ (पारंपरिक रंगोली) बनाकर दीप जलाए जाते हैं।
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सिंगापुर: ‘लिटिल इंडिया’ में हफ्तों पहले से विशाल मेले, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और जगमगाती रोशनी आकर्षण का केंद्र बनती है।
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त्रिनिदाद-टोबैगो, गुयाना, फिजी व मॉरीशस: 19वीं सदी में पहुंचे भारतीय प्रवासियों की यह धरोहर आज राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है। त्रिनिदाद का ‘दिवाली नगर’ और मॉरीशस का सार्वजनिक अवकाश भारतीय संस्कृति की जीवंत मिसाल हैं।
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ब्रिटेन व अमेरिका: ब्रिटेन के लीस्टर में भारत के बाहर सबसे बड़ा दिवाली उत्सव मनाया जाता है। वहीं अमेरिका में व्हाइट हाउस से लेकर न्यूयॉर्क व कैलिफोर्निया के टाइम्स स्क्वायर तक सार्वजनिक दीपोत्सव का आयोजन होता है।
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सर्वधर्म समभाव का प्रतीक
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सिख धर्म (बंदी छोड़ दिवस): इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी 52 राजाओं सहित ग्वालियर के किले से रिहा होकर अमृतसर पहुंचे थे। इस उपलक्ष्य में श्री हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) को दीपमालाओं से सजाया जाता है।
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जैन धर्म (महावीर निर्वाण दिवस): 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को पावापुरी में इसी पावन तिथि पर मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। जैन समाज इसे ज्ञान के प्रकाश के रूप में दीप जलाकर मनाता है। हाईवे पर बिना रुके कटेगा टोल: NHAI ने बैरियर-मुक्त ‘मल्टी-लेन फ्री फ्लो’ टोलिंग के लिए जारी किए नए दिशानिर्देश, खत्म होंगी गाड़ियों की कतारें


शास्त्र मान्यता: गृहस्थों और व्यापारियों के लिए प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ काल) में लक्ष्मी पूजन सबसे उत्तम और स्थायी फलदायी माना जाता है, जिससे घर में मां लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
