अब 9वीं के बस्ते में ‘सेंगोल’ से लेकर ‘लिज्जत पापड़’ तक का सफर जुड़ गया है और एनसीईआरटी ने कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ बाजार में उतार दी है। इस बार पाठ्यक्रम में सियासत, इतिहास और टैक्स से लेकर स्टार्टअप तक का एक अनोखा मेल देखने को मिल रहा है, जो बच्चों की पढ़ाई को पूरी तरह बदलने वाला है।
किताब के ‘शासन और लोकनीति’ अध्याय में विवादों में रहे ‘सेंगोल’ को चोल राजवंश की परंपरा से जोड़ते हुए ‘धर्मसम्मत शासन’ का सांस्कृतिक प्रतीक बताया गया है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि कैसे 15 अगस्त 1947 की रात इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया था और साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नए संसद भवन में स्थापित किया।
इसके साथ ही ‘सत्यमेव जयते’ और सुप्रीम कोर्ट के ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ के मूल अर्थ को भी समझाया गया है ताकि बच्चे देश की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकें।
बच्चों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखते हुए व्यक्तिगत वित्त प्रबंधन की बारीकियां भी सिखाई जा रही हैं। वित्त वर्ष के नियमों के आधार पर टैक्स कैलकुलेशन समझाई गई है, और साथ ही यह मजबूत संदेश भी दिया गया है कि समय पर और ईमानदारी से टैक्स भरना हर जिम्मेदार नागरिक का फर्ज है।
इतिहास के पन्नों में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कालखंड 1000 से 1700 ईस्वी के बीच अब सिर्फ आक्रान्तों के हमलों की बात नहीं है, बल्कि यह बताया गया है कि भारतीय समाज और राजाओं ने उनका प्रतिरोध कैसे किया। इसमें मदुरै के राजा वीरप्पा और शाहजहां के समकालीन चित्तौड़ के राजा द्वारा उदयपुर में बनवाए गए भव्य जगदीश मंदिर जैसे गौरवशाली प्रसंगों को शामिल किया गया है जो भारतीय वास्तुकला और स्वाभिमान की गाथा कहते हैं।
उद्यमिता को समझाने के लिए किसी विदेशी बिजनेस केस स्टडी की बजाय लिज्जत पापड़ की प्रेरणादायक देसी कहानी को जगह दी गई है। साल 1959 में मुंबई की सात महिलाओं द्वारा मात्र 80 रुपये और उधार के सामान से शुरू हुआ यह सफर आज 45 हजार से ज्यादा महिलाओं और एक बड़े टर्नओवर वाले साम्राज्य में कैसे बदला, यह बच्चे अब अपनी किताब में पढ़ेंगे।
एनसीईआरटी ने खुद माना है कि पहले पाठ्यक्रम में ‘सत्ता’ विषय था, जिसे बदलकर ‘शासन और लोकनीति’ कर दिया गया है ताकि बच्चों पर कठिन और अमूर्त वैचारिक बोझ न पड़े। पढ़ाई को अधिक रुचिकर बनाने के लिए किए गए ये बदलाव साफ दिखाते हैं कि अब स्कूली शिक्षा रटने की बजाय व्यावहारिक जीवन, भारतीय संस्कृति और आत्मनिर्भरता के इर्द-गिर्द घूम रही है।























