रायपुर: छत्तीसगढ़ में धान खरीदी व्यवस्था में गड़बड़ियों को रोकने और वास्तविक रकबे की सटीक पहचान के लिए राज्य सरकार ने अंतरिक्ष तकनीक का सहारा लिया है। अब खेतों में धान बोया गया है या नहीं, इसका सत्यापन आसमान से सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) तकनीक के जरिए होगा। इसके लिए खाद्य संचालनालय और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CGCOST) के बीच एक अहम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा, खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, खाद्य संचालक डॉ. फरिहा आलम और सीजीकॉस्ट के संचालक प्रशांत कविश्वर मौजूद रहे।
तकनीक से बदलेगी धान उपार्जन की तस्वीर
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अक्षांश-देशांतर (Lat-Long) से सैटेलाइट का मिलान: किसानों के भू-अभिलेखों में दर्ज खेतों के सटीक अक्षांश और देशांतर का मिलान सैटेलाइट तस्वीरों से किया जाएगा। इससे यह कंप्यूटर स्क्रीन पर ही साफ हो जाएगा कि संबंधित खसरे पर धान की फसल खड़ी है या नहीं।
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फर्जी पंजीयन और कागजी रकबे पर रोक: सैटेलाइट डेटा और डिजिटल क्रॉप सर्वे के सीधे जुड़ाव से धान उपार्जन में इंसानी दखल घटेगा, जिससे फर्जी गिरदावरी, रकबा बढ़ाने या बिना फसल के धान बेचने जैसी अनियमिताओं पर पूरी तरह लगाम लगेगी।
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पारदर्शी डेटा व्यवस्था: उपार्जन केंद्रों पर वास्तविक किसानों को समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने और सरकारी खजाने की सुरक्षा के लिए यह डेटा रीढ़ की हड्डी साबित होगा।
FRA और डुबान क्षेत्रों की बनेगी ‘डिजिटल पॉलीगॉन लेयर’
जिन क्षेत्रों में पारंपरिक राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं या जहां सीमांकन में मुश्किलें आती हैं, उनके लिए यह तकनीक क्रांतिकारी साबित होगी:
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वन अधिकार (FRA) पट्टे: वनांचल क्षेत्रों में आदिवासियों व किसानों को मिले वन अधिकार पट्टों की डिजिटल मैपिंग की जाएगी।
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डुबान क्षेत्र: बांधों और जलाशयों के डुबान क्षेत्र में होने वाली खेती की सटीक भौगोलिक सीमाओं को चिन्हित करने के लिए विशेष GIS पॉलीगॉन लेयर तैयार होगी।
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सटीक रकबा निर्धारण: दुर्गम और वनांचल क्षेत्रों में भी अब बिना मौके पर पहुंचे सैटेलाइट से सटीक रकबे का सत्यापन संभव होगा।
डिजिटल क्रॉप सर्वे को मिला वैज्ञानिक आधार
खाद्य संचालनालय और सीजीकॉस्ट का यह तकनीकी समन्वय राज्य के ‘डिजिटल क्रॉप सर्वे’ को मजबूत भू-स्थानिक (Geospatial) आधार देगा। अब राजस्व रिकॉर्ड, ग्राउंड सर्वे और सैटेलाइट इमेजरी तीनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करेंगे। इससे सरकार के पास राज्य के हर कोने में धान के वास्तविक उत्पादन और रकबे का सबसे विश्वसनीय और वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध रहेगा।























