नई दिल्ली:
भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण तकनीकी और विधिक बदलाव लागू कर दिए हैं। आयोग ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए भरे जाने वाले फॉर्म-6 और उसके साथ संलग्न होने वाले घोषणा पत्र (Declaration) को अब एक-दूसरे से पूरी तरह अलग कर दिया है। यह नई व्यवस्था विशेष गहन पुनरीक्षण के दायरे में आने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड सहित देश के 17 राज्यों में तत्काल प्रभाव से लागू होगी।
नई प्रक्रिया के अंतर्गत अब आवेदकों को फॉर्म-6 और घोषणा पत्र अलग-अलग मॉड्यूल के रूप में ऑनलाइन जमा करने होंगे। पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दोनों ही दस्तावेजों के लिए पृथक रूप से वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) सत्यापन और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (ई-साइन) की प्रक्रिया अनिवार्य की गई है। इसके साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जिन पुराने या पूर्व-पंजीकृत मतदाताओं के नाम प्रारूप मतदाता सूची में छूट गए हैं या दर्ज नहीं हैं, वे भी अंतिम सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए बिना किसी संशय के फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।
दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान प्राप्त कानूनी संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस वैधानिक संरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करने पर सहमति जताते हुए केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी किया है। केंद्र सरकार से चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है, और मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर तय की गई है।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज झा और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण अग्रवाल द्वारा दायर संयुक्त याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य रूप से यह दलील दी गई है कि चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के अंतर्गत चुनाव आयुक्तों को अत्यधिक कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस धारा के प्रावधानों के चलते भ्रष्टाचार, जालसाजी और अन्य गंभीर आपराधिक कृत्यों के मामलों में भी आयुक्तों के विरुद्ध मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जो विधि के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।


